Manipur Conflict: नगा और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच तनाव की क्या है वजह? जानें दशकों पुराने विवाद की पूरी पृष्ठभूमि
मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में नगा और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच फिर से उभरते तनाव और हिंसक टकराव के ऐतिहासिक कारणों, ज़मीन के विवाद और स्वायत्तता की मांगों का विस्तृत विश्लेषण।

- मणिपुर में नगा-कुकी टकराव: ज़मीन, पहचान और सीमांकन को लेकर क्यों उलझे दोनों आदिवासी समुदाय? पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट
- Manipur Tribal Dispute: केवल मैतेई-कुकी तनाव ही नहीं, नगा और कुकी-ज़ो के बीच भी गहराया अविश्वास; समझें संघर्ष के ऐतिहासिक कारण
- नगालैंड सीमा से लगे इलाकों में अशांति: नगा और कुकी-ज़ो विवाद की आंतरिक परतें, स्वायत्तता की मांग और सुरक्षा चुनौतियां
इंफाल / नई दिल्ली: पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में जातीय संघर्ष का ताना-बाना केवल घाटी में रहने वाले गैर-जनजातीय मैतेई और पहाड़ी क्षेत्रों के कुकी-ज़ो समुदाय तक ही सीमित नहीं है। राज्य के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में नगा और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच भी दशकों पुराना अविश्वास और क्षेत्रीय वर्चस्व का टकराव समय-समय पर हिंसक रूप लेता रहा है। हाल के दिनों में सीमावर्ती पहाड़ी जनपदों में दोनों समुदायों के बीच हुई झड़पों और जान-माल के नुकसान ने राज्य में शांति बहाली की प्रक्रिया के सामने एक और जटिल चुनौती खड़ी कर दी है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सुरक्षा तंत्र द्वारा इन क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच भू-स्वामित्व, प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर उपजा तनाव काफी गहरा है।
- विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1990 के दशक का खूनी संघर्ष
नगा और कुकी समुदायों के बीच वर्तमान कटुता को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक संदर्भ को देखना आवश्यक है। दोनों ही समुदाय राज्य के पहाड़ी जिलों में बसे हुए हैं, लेकिन उनकी सामाजिक संरचना, भूमि प्रबंधन और राजनीतिक लक्ष्य एक-दूसरे से काफी भिन्न रहे हैं।
1992 से 1997 के बीच मणिपुर ने नगा और कुकी समुदायों के बीच भीषण जातीय नरसंहार का दौर देखा था। उस दौरान 'ग्रेटर नगालिम' (नगा बहुल क्षेत्रों को मिलाकर एक संयुक्त प्रशासनिक इकाई) की मांग और कुकी संगठनों द्वारा अपने लिए एक अलग स्वायत्त राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की मांग के बीच हिंसक टकराव हुआ था। उस संघर्ष में सैकड़ों नागरिकों ने अपनी जान गंवाई थी और हजारों लोग विस्थापित हुए थे। 13 सितंबर 1993 को जुंगपी नरसंहार (Joupi Massacre) की घटना आज भी कुकी समुदाय की स्मृति में एक गहरे घाव की तरह दर्ज है। हालांकि बाद के वर्षों में दोनों पक्षों के सामाजिक संगठनों और चर्च समूहों की मध्यस्थता से स्थिति संभली, लेकिन अविश्वास की दीवार पूरी तरह कभी नहीं ढह सकी।
- ज़मीन का मालिकाना हक और क्षेत्रीय ओवरलैपिंग
दोनों समुदायों के बीच विवाद का सबसे बुनियादी बिंदु भूमि का अधिकार और भौगोलिक सीमाएं हैं। नगा जनजाति की परंपरा के अनुसार, भूमि का स्वामित्व समुदाय या पैतृक ग्राम परिषदों के अधीन होता है। नगाओं का मानना है कि मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से उनके पैतृक अधिकार क्षेत्र में आते हैं। दूसरी ओर, कुकी-ज़ो समुदाय में भूमि का प्रबंधन पारंपरिक ग्राम प्रमुखों (चीफशिप प्रणाली) के हाथों में होता है। 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान हुए प्रवास और बस्तियों के विस्तार के कारण मणिपुर के कई पहाड़ी जिलों में नगा और कुकी गांव एक-दूसरे से सटे हुए हैं। उखरुल, सेनापति, चंदेल, तामेंगलांग और कांगपोकपी जैसे जिलों में दोनों समुदायों की बस्तियां समानांतर रूप से फैली हैं। जब भी कोई एक समुदाय अपने पारंपरिक क्षेत्र पर नियंत्रण मजबूत करने या नई चौकियां स्थापित करने का प्रयास करता है, तो दूसरे पक्ष को यह अपनी संप्रभुता और अस्तित्व पर खतरा महसूस होता है।
- प्रशासनिक मांगों का अंतर्विरोध: अलग प्रशासन बनाम प्रादेशिक अखंडता
मई 2023 से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जारी जातीय हिंसा के बाद कुकी-ज़ो संगठनों ने केंद्र सरकार से 'अलग प्रशासन' (Separate Administration) या केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग तेज कर दी। यही मांग नगा समाज के लिए नई चिंता का कारण बन गई। मणिपुर में सक्रिय शीर्ष नगा नागरिक संगठन—जैसे 'यूनाइटेड नगा काउंसिल' (UNC)—का स्पष्ट रुख है कि यदि केंद्र सरकार कुकी बहुल क्षेत्रों के लिए किसी विशेष प्रशासनिक ढांचे या केंद्र शासित प्रदेश की घोषणा करती है, तो उसमें नगाओं के पैतृक क्षेत्रों को बिल्कुल भी शामिल नहीं किया जाना चाहिए। नगा नेतृत्व का तर्क है कि कई ऐसे इलाके हैं जिन्हें कुकी संगठन अपने प्रभाव क्षेत्र में बताते हैं, जबकि वे ऐतिहासिक रूप से नगा बस्तियां रही हैं। दोनों समुदायों के दावों के बीच यह 'भूगोलीय ओवरलैपिंग' मौजूदा तनाव की सबसे बड़ी तात्कालिक वजह बन गई है।
- राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवैध वसूली और चेकपोस्ट विवाद
मणिपुर के लिए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का मुख्य जरिया राष्ट्रीय राजमार्ग-2 (इम्फाल-दीमापुर) और राष्ट्रीय राजमार्ग-37 (इम्फाल-जिरीबाम) हैं। ये दोनों सड़कें पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इन रणनीतिक मार्गों पर दोनों समुदायों के सशस्त्र समूह और स्थानीय निगरानी समितियां अपना प्रभाव स्थापित करना चाहती हैं। वाहनों से अवैध टैक्स वसूली (Extortion) और पहचान पत्र जांच के नाम पर होने वाले अवरोध कई बार हिंसक झड़प का कारण बनते हैं। जब एक पक्ष के किसी नागरिक या वाहन चालक को दूसरे पक्ष के इलाके में रोका जाता है या उसके साथ दुर्व्यवहार होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया तुरंत दूसरे इलाके में देखने को मिलती है। हालिया घटनाओं में भी वाहनों की आवाजाही को लेकर उपजा विवाद ही हिंसक झड़पों की मुख्य वजह बना। असम राइफल्स और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सामने इस समय मणिपुर में बहुकोणीय सुरक्षा संकट है। एक ओर जहां उन्हें घाटी और तलहटी के बीच 'बफर जोन' बनाकर मैतेई और कुकी समूहों को आमने-सामने आने से रोकना पड़ता है, वहीं अब पहाड़ी क्षेत्रों के भीतर नगा और कुकी आबादी के बीच शांति कायम रखने के लिए अतिरिक्त चौकियां बनानी पड़ रही हैं।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर का समाधान केवल दो समुदायों के बीच समझौते से नहीं निकल सकता। इसमें नगा, कुकी-ज़ो और मैतेई—तीनों प्रमुख हितधारकों को एक मंच पर लाना होगा। जब तक भूमि सीमांकन, पारंपरिक अधिकारों और प्रशासनिक पुनर्गठन के मुद्दों पर पारदर्शी और समावेशी संवाद नहीं होगा, तब तक पर्वतीय जनपदों में स्थायी शांति स्थापित करना बेहद चुनौतीपूर्ण रहेगा।
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