हरिद्वार के सराय गांव में पानी की टंकी से निकले 27 सांप के बच्चे, नजारा देखकर परिजनों के उड़े होश
उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन नगरी हरिद्वार के ज्वालापुर कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत आने वाले सराय ग्राम में एक
- घरेलू जल स्रोत में रेंगते जहरीले जीवों को देखकर पूरे इलाके में फैली भारी दहशत, ग्रामीणों ने बंद किए अपने घरों के दरवाजे
- वन विभाग की रेस्क्यू टीम ने दो घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद सभी सँपोलों को सुरक्षित निकाला, घने जंगल में किया गया मुक्त
उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन नगरी हरिद्वार के ज्वालापुर कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत आने वाले सराय ग्राम में एक ऐसा खौफनाक और हैरान कर देने वाला वाकया सामने आया है, जिसने न केवल एक पीड़ित परिवार बल्कि समूचे ग्रामीण इलाके के निवासियों को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। गांव में स्थित एक साधारण रिहायशी मकान की छत पर रखी पानी की मुख्य टंकी में उस समय अप्रत्याशित रूप से अफरा-तफरी मच गई, जब घरेलू उपयोग के लिए पानी की जांच करने गए परिजनों को टंकी के भीतर एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 27 सांप के छोटे बच्चे यानी सँपोले एक साथ रेंगते और तैरते हुए दिखाई दिए। इस खौफनाक मंजर को देखते ही पूरे परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई और घर के भीतर चीख-पुकार मच गई। देखते ही देखते यह खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई, जिसके बाद आसपास के सैकड़ों ग्रामीण उस घर के बाहर एकत्रित हो गए और पूरे क्षेत्र में भारी दहशत और असुरक्षा का माहौल व्याप्त हो गया।
इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना की शुरुआत बेहद सामान्य तरीके से हुई थी, जब रविवार की सुबह घर की महिलाएं दैनिक कामकाज और खाना पकाने के लिए नल चालू कर पानी का इस्तेमाल कर रही थीं। इसी दौरान पानी की आपूर्ति में कुछ व्यवधान महसूस हुआ और नलों से आने वाले पानी का रंग और प्रवाह कुछ बदला हुआ प्रतीत हुआ। इसी तकनीकी समस्या की जांच करने और पानी के स्तर को देखने के लिए परिवार का एक युवा सदस्य सीढ़ियों के सहारे छत पर चढ़ गया और जैसे ही उसने प्लास्टिक की भारी पानी की टंकी का मुख्य ढक्कन हटाया, वैसे ही उसके होश उड़ गए। टंकी की तली में और पानी की सतह पर काले-भूरे रंग के अनगिनत सँपोले तेजी से चक्कर काट रहे थे। युवक इस खौफनाक दृश्य को सहन नहीं कर सका और उल्टे पांव नीचे की ओर भागा, जिसके बाद पूरे परिवार को इस भीषण संकट से अवगत कराया गया।
टंकी के भीतर इतनी भारी संख्या में रेंगते हुए सांपों की मौजूदगी की खबर मिलते ही गांव के लोग अपनी सुरक्षा को लेकर अत्यधिक चिंतित हो गए और कई परिवारों ने एहतियात के तौर पर अपने छोटे बच्चों को घरों के भीतर बंद कर लिया। ग्रामीणों का मानना था कि यदि टंकी के भीतर 27 बच्चे मौजूद हैं, तो निश्चित रूप से उनकी बेहद जहरीली और आक्रामक मां भी उसी मकान के किसी गुप्त कोने, पाइपलाइन या आस-पास की झाड़ियों में कहीं न कहीं छिपी हुई हो सकती है। इस संभावित खतरे के कारण ग्रामीणों ने लाठी-डंडे हाथ में उठा लिए और पूरे घर की घेराबंदी कर दी, लेकिन पानी के भीतर मौजूद उन फुर्तीले जीवों को बिना किसी नुकसान के बाहर निकालना बेहद जटिल और जोखिम भरा काम था, जिसके कारण स्थानीय पुलिस और संबंधित प्रशासनिक अमले को भी इसकी प्रारंभिक सूचना दी गई। मानसून पूर्व की हलचल और अत्यधिक गर्मी के मौसम में अक्सर जमीन के भीतर का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है, जिसके कारण सरीसृप वर्ग के जीव ठंडे और नम स्थानों की तलाश में मानव बस्तियों और घरों के भीतर बने भूमिगत जल स्रोतों या छतों पर रखी टंकियों की ओर रुख करते हैं। सराय गांव की यह घटना इसी मौसमी परिवर्तन और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों में आ रही कमियों का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है।
स्थिति की गंभीरता और ग्रामीणों के बढ़ते दबाव को देखते हुए पीड़ित परिवार के मुखिया ने बिना कोई समय गंवाए तत्काल इसकी लिखित और दूरभाष के माध्यम से सूचना वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया टीम (रैपिड रेस्क्यू टीम) को दी। सूचना प्राप्त होते ही हरिद्वार वन प्रभाग के उच्च अधिकारियों के निर्देश पर अनुभवी सर्प विशेषज्ञों और रेस्क्यू उपकरणों से लैस एक विशेष चार सदस्यीय टीम फौरन सराय गांव के लिए रवाना हो गई। जब तक वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची, तब तक भयभीत ग्रामीणों ने पानी की टंकी को चारों तरफ से घेर रखा था और कुछ लोग पारंपरिक तरीकों से सांपों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन वन कर्मियों ने तुरंत स्थिति को अपने नियंत्रण में लिया और लोगों को सुरक्षित दूरी बनाए रखने की सख्त हिदायत दी।
वन विभाग के कुशल रेस्क्यू एक्सपर्ट्स ने बेहद सावधानी और वैज्ञानिक पद्धति का पालन करते हुए सबसे पहले टंकी के भीतर मौजूद पानी को धीरे-धीरे एक सुरक्षित निकास के जरिए बाहर निकाला, ताकि सांपों को पकड़ने के लिए स्पष्ट दृश्यता हासिल की जा सके। इसके बाद विशेष सर्प चिमटों (स्नेक हुक्स) और जालीदार बैगों की मदद से एक-एक करके बेहद फुर्तीले और जहरीले स्वभाव वाले उन सभी 27 सँपोलों को बिना किसी चोट के पानी की टंकी से बाहर निकालने का रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। लगभग दो घंटे तक चले इस बेहद सांस रोक देने वाले और थकाऊ अभियान के बाद सभी छोटे सांपों को सफलतापूर्वक पकड़कर सुरक्षित एयर-टाइट प्लास्टिक के डिब्बों और जूट के बोरों में बंद कर लिया गया, जिसके बाद जाकर पीड़ित परिवार और स्थानीय ग्रामीणों ने राहत की सांस ली।
सभी सँपोलों को सुरक्षित रूप से रेस्क्यू करने के बाद वन विभाग के अधिकारियों ने उनकी शारीरिक स्थिति और प्रजाति का गहनता से वैज्ञानिक परीक्षण किया। प्राथमिक जांच में यह बात सामने आई कि ये सभी सँपोले स्थानीय पर्यावरण में पाए जाने वाले अत्यधिक विषैले और आक्रामक कोबरा अथवा रसेल वाइपर प्रजाति के हो सकते हैं, जिनका एक छोटा सा दंश भी किसी वयस्क मनुष्य के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। वन विभाग की टीम ने इन सभी जीवों को जिला मुख्यालय स्थित मुख्य वन कार्यालय ले जाकर उनकी आवश्यक कागजी और वैधानिक प्रविष्टियां पूरी कीं, और बाद में उच्चाधिकारियों की उपस्थिति में उन्हें मानवीय आबादी से कई किलोमीटर दूर राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के घने और सुरक्षित प्राकृतिक जंगल के भीतर पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से मुक्त कर दिया गया।
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