Supreme Court Roster Controversy: नोएडा डीएम मेधा रूपम मामले की सुनवाई पर उठे सवाल, प्रिवेंटिव डिटेंशन रोस्टर से बाहर बेंच के समक्ष लिस्टिंग पर विधिक बहस

नोएडा डीएम मेधा रूपम की एनएसए से जुड़ी याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर प्रक्रियागत सवाल उठे हैं। 13 जुलाई 2026 के रोस्टर के तहत यह मामला संबंधित बेंच के दायरे में नहीं था।

Sep 25, 2026 - 12:02
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Supreme Court Roster Controversy: नोएडा डीएम मेधा रूपम मामले की सुनवाई पर उठे सवाल, प्रिवेंटिव डिटेंशन रोस्टर से बाहर बेंच के समक्ष लिस्टिंग पर विधिक बहस
  • सुप्रीम कोर्ट में केस लिस्टिंग पर विवाद: जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच में कैसे पहुंची मेधा रूपम की NSA याचिका? वकीलों ने प्रक्रिया पर जताई आपत्ति
  • Noida DM Case & SC Roster: प्रिवेंटिव डिटेंशन मामलों के लिए तय नहीं थी बेंच, फिर भी हुई सुनवाई; 'मास्टर ऑफ रोस्टर' व्यवस्था पर कानूनी हलकों में चर्चा
  • मेधा रूपम याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में प्रक्रियागत सवाल: 13 जुलाई के रोस्टर के विपरीत सुनवाई का आरोप, जानिए क्या है पूरा कानूनी विवाद

नई दिल्ली। गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) के मामले में दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई अब एक बड़े विधिक और प्रक्रियागत विवाद के केंद्र में आ गई है। 23 सितंबर को न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के कुछ अंशों पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिसमें डीएम के वेतन से 5 लाख रुपये मुआवजे की वसूली और प्रतिकूल टिप्पणियां शामिल थीं। हालांकि, इस न्यायिक आदेश के तुरंत बाद कानूनी गलियारों और बार एसोसिएशन के वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा मामले की लिस्टिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं।

आपत्ति का मुख्य आधार शीर्ष अदालत द्वारा 13 जुलाई 2026 से प्रभावी आधिकारिक रोस्टर है। बार के विशेषज्ञों और अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) से जुड़े मामलों की सुनवाई का विषयगत अधिकार क्षेत्र जस्टिस शर्मा और जस्टिस सिंह की बेंच के रोस्टर में शामिल नहीं था। इस तकनीकी और प्रक्रियागत विसंगति के सामने आने के बाद 'मास्टर ऑफ रोस्टर' के प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल और केस आवंटन की निष्पक्षता पर कानूनी हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

  • 13 जुलाई के रोस्टर में क्या है व्यवस्था?

सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक नियमों के तहत मामलों के त्वरित और पारदर्शी निपटारे के लिए विषय-वार रोस्टर तय किया जाता है, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अधिसूचित किया जाता है। 13 जुलाई 2026 से लागू किए गए आधिकारिक रोस्टर के अनुसार:

बंदी प्रत्यक्षीकरण और प्रिवेंटिव डिटेंशन (विषय श्रेणी संख्या 2201 और 2202) से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई केवल शुरुआती चार वरिष्ठतम पीठों को सौंपी गई है।

इन चार पीठों की अध्यक्षता क्रमशः भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस एम.एम. सुंदरेश कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली अदालत के नियमित रोस्टर में प्रिवेंटिव डिटेंशन (श्रेणी 2202) का विषयगत कार्यक्षेत्र आधिकारिक तौर पर शामिल नहीं है।

यही वजह है कि जब 23 सितंबर की दैनिक वाद सूची (कॉज लिस्ट) में नोएडा डीएम और राज्य सरकार की याचिका सीधे जस्टिस शर्मा की अदालत में सूचीबद्ध हुई, तो वकीलों और विधिक विश्लेषकों ने इस पर अचरज व्यक्त किया।

  • जुड़ा हुआ मामला पहले से दूसरी बेंच के पास लंबित

मामले की पृष्ठभूमि में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह सामने आया है कि नोएडा औद्योगिक श्रमिक आंदोलन और उसी घटनाक्रम से जुड़े अन्य प्रिवेंटिव डिटेंशन व बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले पहले से ही जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं। सामान्य न्यायिक परिपाटी और सुप्रीम कोर्ट की स्थापित परंपरा के तहत एक ही प्राथमिक घटना या एफआईआर से उपजे जुड़े हुए मामलों (Connected Matters) को उसी अदालत के समक्ष भेजा जाता है, जो पहले से उस पूरे संदर्भ की सुनवाई कर रही हो।

जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने मई महीने में इसी आंदोलन से जुड़े दो अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर सुनवाई करते हुए पुलिस को आरोपियों को पेश करने का निर्देश दिया था और मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की थी कि मजदूरी वृद्धि की मांग को लेकर प्रदर्शन करने वालों के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में जब छात्रा आकृति चौधरी पर लगे रासुका को हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के खिलाफ शासन और डीएम की अपील आई, तो उसे पहले से मामले की सुनवाई कर रही बेंच के बजाय एक ऐसी बेंच के सामने लगाया गया जिसके पास प्रिवेंटिव डिटेंशन का रोस्टर ही नहीं था।

  • वकीलों का रुख: 'स्पेशल असाइनमेंट' या प्रक्रियागत विचलन?

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सहित कई कानूनी विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस लिस्टिंग पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब चार विशिष्ट पीठों को प्रिवेंटिव डिटेंशन का कार्यभार सौंपा गया है और एक संबंधित मामला पहले से वरिष्ठ पीठ के पास है, तो इस मामले को विशेष रूप से अलग अदालत में क्यों भेजा गया?

कानूनी जानकारों का यह भी मानना है कि रोस्टर नियमों के तहत मुख्य न्यायाधीश के पास 'विशेष रूप से सौंपे गए किसी भी मामले' (Specially Assigned Matters) को किसी भी बेंच को भेजने का प्रशासनिक विशेषाधिकार अवश्य है। लेकिन ऐसे विशेष आवंटन के पीछे कोई पारदर्शी प्रशासनिक कारण या न्यायिक औचित्य दर्ज होना चाहिए। यदि बिना किसी स्पष्ट संदर्भ के संवेदनशील मामलों को नियमित रोस्टर से हटाकर दूसरी बेंचों में भेजा जाता है, तो इससे सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक केस-फ्लो मैनेजमेंट व्यवस्था पर सवालिया निशान लगते हैं।

उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को सुनवाई के दौरान पीठ ने प्रारंभिक आदेश जारी करते हुए हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 27 से 33 के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी, जिसमें डीएम के वेतन से कटौती और सेवा रिकॉर्ड में प्रतिकूल प्रविष्टि का हिस्सा शामिल था। अदालत ने बाद में स्पष्ट किया कि छात्रा की हिरासत रद्द करने के मूल निर्णय पर कोई रोक नहीं है, बल्कि राहत केवल अधिकारियों के वित्तीय व सेवा संबंधी व्यक्तिगत दायित्व तक सीमित है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को प्रस्तावित है। कानूनी हलकों में अब इस बात पर नजर रहेगी कि क्या आगामी सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष की कानूनी टीम इस प्रक्रियागत विसंगति और रोस्टर उल्लंघन के मुद्दे को अदालत के समक्ष औपचारिक रूप से उठाएगी, और क्या इस याचिका को प्रिवेंटिव डिटेंशन के आधिकारिक रोस्टर वाली बेंच को स्थानांतरित (री-एलोकेट) किया जाएगा।

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