Judge Ravi Kumar Diwakar: मुजफ्फरनगर के एडीजे रवि कुमार दिवाकर की फैसले में तल्ख टिप्पणी, न्यायिक गलियारों में हलचल
मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में लिखा कि वे डरपोक जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे। जानें पूरा मामला।

- 'मरना पसंद है, डरपोक जज कहलाना नहीं': मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर ने फैसले में दर्ज की साहसिक टिप्पणी
- 'डरपोक जज कहलाने से बेहतर मरना पसंद करूंगा': मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में क्यों लिखी यह बात?
- मुजफ्फरनगर के एडीजे रवि कुमार दिवाकर का बड़ा बयान: फैसले में लिखा- 'मुझे मरना पसंद, लेकिन डरपोक जज कहलाना नहीं'
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित अपर जिला एवं सत्र न्यायालय से न्यायिक निष्पक्षता और व्यक्तिगत दृढ़ता का एक ऐतिहासिक उदाहरण सामने आया है। मुजफ्फरनगर के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) रवि कुमार दिवाकर ने एक कानूनी प्रकरण में अपना फैसला सुनाते हुए आदेश पत्र में अत्यंत तल्ख और साहसिक टिप्पणी दर्ज की है। न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि वे जीवन में मृत्यु का वरण करना स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन किसी भी सूरत में 'डरपोक जज' कहलाना उन्हें कतई पसंद नहीं है। कानूनी बिरादरी और न्यायिक हलकों में एडीजे दिवाकर का यह कड़ा रुख तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। इस साहसिक टिप्पणी को किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या अनुचित दबाव के खिलाफ एक स्पष्ट और कड़ा न्यायिक संदेश माना जा रहा है।
मुजफ्फरनगर में तैनात अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक विचाराधीन मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद जब निर्णय पत्र पर हस्ताक्षर किए, तो उसमें दर्ज न्यायिक अवलोकन ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपने लिखित आदेश के प्रमुख अंशों में यह दर्ज किया कि न्याय की गद्दी पर आसीन व्यक्ति का एकमात्र दायित्व भारतीय संविधान, विधि के स्थापित सिद्धांतों और साक्ष्यों के प्रति होता है।
अपने विस्तृत आदेश में न्यायाधीश दिवाकर ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका के अधिकारियों को निष्पक्ष निर्णय देते समय किसी भी प्रकार के डर, सामाजिक अथवा राजनीतिक प्रभाव या व्यक्तिगत सुरक्षा की चिंताओं को आड़े नहीं आने देना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने यह सख्त वाक्य दर्ज किया कि उन्हें मरना स्वीकार है, लेकिन इतिहास में एक कमजोर और भयभीत न्यायाधीश के रूप में अपनी पहचान छोड़ना बिल्कुल अस्वीकार्य है।
अदालत में चल रहे इस मुकदमे की पृष्ठभूमि काफी जटिल थी, जिसमें लंबे समय से दोनों पक्षों के मध्य कानूनी दांव-पेंच चल रहे थे। सुनवाई के दौरान कई अवसरों पर परिस्थितियों में तनाव देखा गया और न्यायिक प्रक्रिया पर परोक्ष असर डालने के संकेतों का आभास हुआ। हालांकि, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने तमाम कानूनी पेचीदगियों और दलीलों की सूक्ष्म जांच करने के उपरांत पूर्णतः साक्ष्यों के आधार पर निर्णय सुनाने का मार्ग चुना।
उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर पूर्व में भी संवेदनशील मामलों में अपनी बेबाक कार्यशैली और सुरक्षा चिंताओं को लेकर चर्चा में रह चुके हैं। इस आदेश में उन्होंने दर्ज किया कि एक न्यायिक अधिकारी को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय कई प्रकार की विषम परिस्थितियों और अंतर्द्वंद्व का सामना करना पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर कोई न्यायाधीश दबाव या भय के आगे झुककर समझौता करता है, तो यह न्याय व्यवस्था की आत्मा पर प्रहार है। इसी निष्ठा को रेखांकित करते हुए उन्होंने यह साहसिक टिप्पणी अपने फैसले का स्थायी हिस्सा बनाई।
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के इस आदेश की प्रति सार्वजनिक होते ही विधिक जगत से जुड़ी हस्तियों और बार एसोसिएशन के सदस्यों ने उनके इस निर्भीक दृष्टिकोण का पुरजोर समर्थन किया है। वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि एडीजे दिवाकर का यह रुख निचली न्यायपालिका के अधिकारियों के नैतिक बल को सुदृढ़ करने वाला है। वकीलों के अनुसार जब कोई न्यायिक अधिकारी दबावों की परवाह किए बिना अपनी अंतरात्मा और कानून के अनुसार फैसला सुनाता है, तो आम जनमानस में न्याय व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास पैदा होता है।
कानूनी विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने भी इस टिप्पणी को न्यायिक सत्यनिष्ठा और साहस का उत्कृष्ट प्रतिमान करार दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रायल कोर्ट स्तर पर कार्यरत न्यायाधीशों को स्थानीय स्तर पर कई विषम दबावों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में एडीजे दिवाकर का यह आदेश एक प्रकाश स्तंभ की तरह अन्य अधिकारियों को भी निष्पक्ष और निडर बने रहने की प्रेरणा देता है।
इस आदेश का असर केवल संबंधित मुकदमे के फैसले तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वायत्तता को लेकर एक नए राष्ट्रीय विमर्श को जन्म दिया है। मुजफ्फरनगर कोर्ट से आए इस संदेश ने यह साबित कर दिया है कि निष्पक्ष न्याय के आगे कोई भी बाहरी ताकत प्रभावी नहीं हो सकती।
इसके अतिरिक्त, इस प्रकरण ने उन असामाजिक और प्रभावशाली तत्वों को भी कड़ा संदेश दिया है जो मुकदमों के दौरान न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की मंशा रखते हैं। आम नागरिकों के बीच इस फैसले के आने से यह विश्वास और पुख्ता हुआ है कि अदालतें केवल और केवल विधि के शासन पर काम करती हैं।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर का यह फैसला अब उच्च न्यायिक मंचों और विधिक संस्थानों में एक नजीर के तौर पर देखा जा रहा है। कानूनी जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में जब भी न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और निर्भीकता पर चर्चा होगी, तो मुजफ्फरनगर कोर्ट के इस आदेश को प्रमुखता से उद्धृत किया जाएगा। यह आदेश युवा न्यायिक अधिकारियों को हर परिस्थिति में निष्पक्ष न्याय के मार्ग पर अडिग रहने का मार्ग दिखाता रहेगा।
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