सोशल मीडिया पर जज पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाने पर मद्रास हाईकोर्ट ने वकील वंचिनाथन को फटकार लगाई।
Madras High Court : मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में 28 जुलाई 2025 को एक नाटकीय सुनवाई हुई, जिसमें वकील एस. वंचिनाथन को जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन पर ....
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच में 28 जुलाई 2025 को एक नाटकीय सुनवाई हुई, जिसमें वकील एस. वंचिनाथन को जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन पर जातीय और सामुदायिक भेदभाव का आरोप लगाने के लिए बुलाया गया। जस्टिस स्वामीनाथन और जस्टिस के. राजशेखर की खंडपीठ ने वंचिनाथन के सोशल मीडिया पोस्ट और साक्षात्कारों को आपराधिक अवमानना माना और इस मामले को अब मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचार के लिए भेज दिया है। इस बीच, आठ रिटायर्ड जजों ने मुख्य न्यायाधीश ऑफ इंडिया (सीजेआई) से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब वकील एस. वंचिनाथन, जो पीपुल्स राइट्स प्रोटेक्शन सेंटर के तमिलनाडु समन्वयक हैं, ने 14 जून 2025 को सीजेआई बी.आर. गवई और सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को 38 पेज का एक पत्र भेजा। इस पत्र में जस्टिस स्वामीनाथन पर 15 गंभीर आरोप लगाए गए, जिनमें जातीय भेदभाव, विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय के वकीलों को तरजीह देने और दलित वकीलों के साथ भेदभाव करने का दावा शामिल था। वंचिनाथन ने यह भी आरोप लगाया कि जस्टिस स्वामीनाथन की कुछ टिप्पणियां और फैसले दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रभावित हैं, जो संवैधानिक अधिकारों और अल्पसंख्यक संरक्षण के मामलों में निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं।
23 जुलाई को एक असंबंधित रिट अपील की सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने देखा कि वंचिनाथन उस मामले में एक पक्ष के वकील थे, हालांकि उन्होंने बाद में वह केस छोड़ दिया था। फिर भी, खंडपीठ ने उन्हें 24 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया और पूछा कि क्या वह अपने आरोपों पर कायम हैं। वंचिनाथन ने मौखिक जवाब देने से इनकार करते हुए लिखित में सवाल देने की मांग की। खंडपीठ ने उन्हें 28 जुलाई को फिर से पेश होने और लिखित जवाब देने का निर्देश दिया।
28 जुलाई की सुनवाई में जस्टिस स्वामीनाथन ने वंचिनाथन को "कॉमेडी पीस" कहकर संबोधित किया और कहा, "मुझे नहीं पता कि आपको क्रांतिकारी कौन कहता है। आप सब कॉमेडी पीस हैं।" उन्होंने वंचिनाथन के चार साल से चल रहे कथित मानहानिकारक अभियान पर नाराजगी जताई, लेकिन यह भी कहा कि वह उनके फैसलों की आलोचना का सम्मान करते हैं। हालांकि, जातीय भेदभाव का आरोप लगाना एक अलग और गंभीर मामला है। खंडपीठ ने एक यूट्यूब साक्षात्कार का वीडियो कोर्ट में चलाया, जिसमें वंचिनाथन ने कथित तौर पर जस्टिस स्वामीनाथन पर दलित वकील को निशाना बनाने और ब्राह्मण वकील को बख्शने का आरोप लगाया था।
- रिटायर्ड जजों की अपील
इस मामले में आठ रिटायर्ड जजों जस्टिस के. चंद्रू, डी. हरिपरंथमन, सी.टी. सेल्वम, अकबर अली, पी. कलैयारसन, एस. विमला, के.के. ससिधरन और एस.एस. सुंदर ने 26 जुलाई को एक संयुक्त अपील जारी की। उन्होंने सीजेआई से हस्तक्षेप करने और खंडपीठ से वंचिनाथन के खिलाफ अवमानना कार्रवाई को स्थगित करने की मांग की। उनका कहना था कि जज के खिलाफ शिकायत की जांच सीजेआई द्वारा गठित इन-हाउस कमेटी के जरिए होनी चाहिए, न कि संबंधित जज द्वारा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले (सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि जज के खिलाफ शिकायत पहले सीजेआई के पास जानी चाहिए।
हालांकि, रिटायर्ड जज के.के. ससिधरन ने बाद में स्पष्ट किया कि उन्हें इस अपील के लिए नहीं पूछा गया और न ही उन्होंने इसकी लिखित सहमति दी थी। जस्टिस स्वामीनाथन ने विशेष रूप से जस्टिस एस.एस. सुंदर के हस्ताक्षर पर दुख जताया, जिन्हें वह सम्मान देते थे। खंडपीठ ने रिटायर्ड जजों की इस अपील को "अनुचित सलाह" करार दिया और कहा कि यह अवमानना के दायरे में आता है, क्योंकि मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
- वंचिनाथन का जवाब
वंचिनाथन ने अपने जवाब में दावा किया कि उनका पत्र सीजेआई को गोपनीय था, लेकिन यह मदुरै हाईकोर्ट के वकीलों के एक व्हाट्सएप ग्रुप में लीक हो गया, जिसे कथित तौर पर बीजेपी से जुड़े वकील संचालित करते हैं। उन्होंने इस लीक के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज की। सुनवाई में उन्होंने कहा कि वह बिना लिखित सवाल के जवाब नहीं देंगे और उनके खिलाफ कार्रवाई उनके सीजेआई को लिखे पत्र से जुड़ी है। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई केवल उनके सोशल मीडिया बयानों और साक्षात्कारों पर आधारित है, न कि सीजेआई को लिखे पत्र पर।
वंचिनाथन ने यह भी कहा कि वह अपने आरोपों को वापस लेने या पुष्टि करने से पहले सटीक सवाल चाहते हैं। खंडपीठ ने उनकी इस मांग को स्वीकार करते हुए लिखित सवाल जारी किया, लेकिन उनके जवाब को असंतोषजनक माना, क्योंकि वह अपने आरोपों पर स्पष्ट जवाब देने से बचते रहे। अंततः, खंडपीठ ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का फैसला किया।
इस घटना ने तमिलनाडु के कानूनी हलकों में हलचल मचा दी है। कई वकीलों और संगठनों, जैसे पीपुल्स राइट्स प्रोटेक्शन सेंटर, ने वंचिनाथन के समर्थन में प्रदर्शन किए। सीपीएम के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने भी जस्टिस स्वामीनाथन की कार्रवाई को "अनुचित" बताया और सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की। दूसरी ओर, कुछ लोगों ने वंचिनाथन के बयानों को गैर-जिम्मेदाराना माना और कहा कि इससे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचती है।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, "फैसलों की आलोचना का मुझे पूरा सम्मान है, लेकिन जज पर व्यक्तिगत रूप से जातीय भेदभाव का आरोप लगाना गलत है। चार साल से आप मेरे खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कर रहे हैं, फिर भी मैंने कोई कार्रवाई नहीं की।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह और जस्टिस राजशेखर प्रक्रिया के नियमों से अच्छी तरह वाकिफ हैं और न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखेंगे।
जस्टिस स्वामीनाथन का न्यायिक रिकॉर्ड उनकी निष्पक्षता को दर्शाता है। उन्होंने मई 2025 में तमिलनाडु सरकार के विश्वविद्यालय कुलपति नियुक्ति संशोधन पर रोक लगाई, सुфи मुस्लिम समुदाय को मुहर्रम मनाने की अनुमति दी, और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की तस्वीरें लॉ कॉलेजों में लगाने का आदेश दिया। इसके बावजूद, वंचिनाथन जैसे कुछ लोगों ने उनके फैसलों को दक्षिणपंथी विचारधारा से जोड़ा है।
यह मामला न्यायपालिका की निष्पक्षता, वकीलों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अवमानना कानून के दायरे पर गंभीर सवाल उठाता है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि वह वंचिनाथन को उनके आरोपों पर सफाई का मौका देना चाहती थी, लेकिन उनके अस्पष्ट जवाब के कारण मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया। रिटायर्ड जजों की अपील और वकीलों के विरोध ने इस मामले को और जटिल बना दिया है। अब सभी की नजरें सीजेआई और मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के फैसले पर टिकी हैं।
Also Read- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जज पर गलत आरोप लगाने वाले शख्स पर लगाया 50 हजार का जुर्माना।
What's Your Reaction?