Judge Ravi Kumar Diwakar: ज्ञानवापी मामले में ऐतिहासिक आदेश देने वाले जज की पूरी कहानी

वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के वीडियोग्राफी सर्वे का ऐतिहासिक आदेश देकर चर्चा में आए सिविल जज रवि कुमार दिवाकर के न्यायिक सफर और कानूनी प्रभाव का विश्लेषण।

Aug 20, 2026 - 13:17
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Judge Ravi Kumar Diwakar: ज्ञानवापी मामले में ऐतिहासिक आदेश देने वाले जज की पूरी कहानी
  • ज्ञानवापी सर्वे का आदेश देकर चर्चा में आए जज रवि कुमार दिवाकर, जानें कानूनी सफर
  • ज्ञानवापी मस्जिद में वीडियोग्राफी सर्वे का फैसला देने वाले जज रवि कुमार दिवाकर क्यों बने थे मिसाल?
  • ज्ञानवापी परिसर सर्वे का आदेश देने वाले न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के न्यायिक फैसलों पर एक नजर

वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर रहते हुए न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर साल 2022 में उस समय पूरे देश की सुर्खियों में आ गए थे, जब उन्होंने ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी परिसर के कोर्ट कमिश्नर द्वारा वीडियोग्राफी सर्वे कराने का ऐतिहासिक निर्देश दिया था। इस आदेश ने दशकों पुराने इस विवाद को कानूनी रूप से एक नया मोड़ दिया और आगे चलकर वैज्ञानिक सर्वेक्षण की नींव रखी। वाराणसी की अदालत में महिलाओं द्वारा दायर नियमित पूजा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर निष्पक्ष साक्ष्य जुटाने के लिए यह कदम उठाया था। इस फैसले के बाद न्यायिक और सामाजिक हलकों में व्यापक चर्चा हुई, जिसने देश के कई अन्य ऐतिहासिक और धार्मिक मामलों की कानूनी दिशा को भी गहराई से प्रभावित किया।

साल 2022 में वाराणसी की स्थानीय अदालत में मां श्रृंगार गौरी की दैनिक पूजा-अर्चना और अन्य देवी-देवताओं के विग्रहों के संरक्षण को लेकर पांच हिंदू महिलाओं ने एक याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर की अदालत में हुई। अदालत ने मामले की गंभीरता और तथ्यों की स्पष्टता को ध्यान में रखते हुए पूरे परिसर का निष्पक्ष निरीक्षण करने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी सर्वे कराने का स्पष्ट आदेश जारी किया। इस आदेश ने दोनों पक्षों के बीच विवाद की वास्तविक स्थिति को अदालत के रिकॉर्ड पर लाने का रास्ता साफ किया।

याचिका पर विचार करते हुए अदालत ने जब सर्वे का पहला निर्देश दिया, तो प्रतिवादी पक्ष की ओर से कई विधिक आपत्तियां दर्ज कराई गईं और कोर्ट कमिश्नर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए। इसके बाद अदालत ने मामले की दोबारा सुनवाई की और न केवल अपने पूर्व के आदेश को बरकरार रखा, बल्कि स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण कार्य में किसी भी प्रकार की बाधा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जज दिवाकर ने जिला प्रशासन और पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए कि वे कोर्ट कमिश्नर की टीम को परिसर के चप्पे-चप्पे का निरीक्षण करने और वीडियोग्राफी पूरी कराने में पूर्ण प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराएं। इसके बाद भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कई दिनों तक वीडियोग्राफी की प्रक्रिया पूरी की गई और उसकी सीलबंद रिपोर्ट अदालत में पेश की गई।

इस न्यायिक आदेश पर दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग विधिक तर्क सामने आए। हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने इस फैसले को सत्य की खोज और साक्ष्य जुटाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम करार दिया। वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने इस आदेश को उपासना स्थल अधिनियम (प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991) की मूल भावना के खिलाफ बताते हुए उच्च न्यायपालिका में चुनौती दी। विभिन्न कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस बात पर मंथन किया कि दीवानी मामलों में मौके की स्थिति का आकलन करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत अदालतों के पास कमीशन नियुक्त करने का व्यापक अधिकार होता है।

जज रवि कुमार दिवाकर के इस फैसले का असर केवल वाराणसी अदालत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे देश के न्यायिक परिदृश्य में एक नई कानूनी बहस को जन्म दिया। वीडियोग्राफी सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे चलकर मामले ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक का सफर तय किया। इसी आदेश के तार्किक विस्तार के रूप में आगे चलकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा वैज्ञानिक सर्वेक्षण किए जाने की रूपरेखा तैयार हुई। इसके अलावा मथुरा और अन्य ऐतिहासिक स्थलों से जुड़े मामलों में भी इसी न्यायिक मिसाल के आधार पर सर्वे की मांगें अदालतों में रखी जाने लगीं।

वाराणसी अदालत से शुरू हुआ यह मामला आज देश की शीर्ष अदालतों में कानूनी परीक्षण के दौर से गुजर रहा है। दीवानी मुकदमों में कोर्ट कमिश्नर और वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट साक्ष्य के रूप में शामिल की जा चुकी हैं, जिन पर दोनों पक्षों की दलीलें जारी हैं। रवि कुमार दिवाकर द्वारा दिए गए उस मूल आदेश को भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में उन महत्वपूर्ण कानूनी पड़ावों में गिना जाता है, जिसने लंबे समय से चले आ रहे विवादों में दस्तावेजी और भौतिक साक्ष्यों के संकलन का विधिक मार्ग प्रशस्त किया।

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