पूर्व सीजेआई बीआर गवई का बयान: जूता हमले से कोई असर नहीं, मुझे हिंदू विरोधी कहना पूरी तरह गलत।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई ने हाल ही में दिए एक विशेष साक्षात्कार में अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम
नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई ने हाल ही में दिए एक विशेष साक्षात्कार में अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में उन पर जूता फेंके जाने की घटना पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यह हमला उनके ऊपर कोई असर नहीं डाल सका। गवई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें हिंदू विरोधी बताना पूरी तरह गलत है। वे सेवानिवृत्ति के बाद किसी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। यह साक्षात्कार इंडिया टुडे और आज तक को दिया गया था, जिसमें गवई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, हेट स्पीच, बुलडोजर न्याय और राजनीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी।
जस्टिस गवई का कार्यकाल 23 नवंबर 2025 को समाप्त हुआ। वे भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश थे और छह महीने के छोटे कार्यकाल में कई चर्चित फैसलों के केंद्र में रहे। साक्षात्कार में उन्होंने जूता फेंकने की घटना को याद करते हुए कहा, "जूता हमले से मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा। मैं नहीं जानता कि उस घटना के पीछे क्या मकसद था।" उन्होंने आगे जोड़ा कि जब वे उस व्यक्ति को माफ करने का फैसला ले रहे थे, तो उन्हें यह पता नहीं था कि गुस्से का कारण उनकी विष्णु मूर्ति से जुड़ी टिप्पणी थी। गवई ने कहा कि कानून की महानता सजा देने में नहीं, बल्कि क्षमा करने में है। यह बयान उनके शांत और दृढ़ चरित्र को दर्शाता है।
यह घटना 6 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर एक में हुई थी। उस समय गवई की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस के विनोद चंद्रन भी मौजूद थे। सुनवाई के दौरान 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने अचानक अपना जूता उतारकर गवई की ओर फेंकने की कोशिश की। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें तुरंत पकड़ लिया। बाहर जाते हुए किशोर चिल्ला रहे थे, "सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान।" पुलिस ने किशोर को हिरासत में लेकर पूछताछ की, लेकिन गवई के निर्देश पर उन्हें उसी दिन रिहा कर दिया गया। उनका जूता भी लौटा दिया गया। किशोर ने बाद में कहा कि उन्हें गवई की टिप्पणी से चोट पहुंची थी और वे अपने कृत्य पर पछतावा नहीं करते।
इस घटना की जड़ 16 सितंबर 2025 को हुई एक सुनवाई में थी। मध्य प्रदेश के खजुराहो के जावरी मंदिर में क्षतिग्रस्त भगवान विष्णु की सात फुट ऊंची मूर्ति के पुनर्निर्माण की मांग वाली जनहित याचिका पर गवई ने टिप्पणी की थी। उन्होंने याचिकाकर्ता से कहा था, "भगवान से जाकर पूछ लो कि वे खुद ही कुछ करें। यह प्रचार के लिए दाखिल की गई याचिका लगती है।" यह मामला यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दायरे में आता है। गवई ने स्पष्ट किया था कि मंदिर की देखभाल एएसआई की जिम्मेदारी है। इस टिप्पणी को सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। कई लोगों ने इसे हिंदू भावनाओं का अपमान बताया। गवई ने 18 सितंबर को सफाई दी कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और उनकी टिप्पणी का संदर्भ गलत समझा गया।
साक्षात्कार में गवई ने हिंदू विरोधी होने के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा, "मुझे हिंदू विरोधी कहना पूरी तरह गलत है। मेरा विवेक साफ है। मैंने हमेशा सभी धर्मों का उच्चतम सम्मान किया है। मेरे पिता एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे और मैंने उनकी यह गुणवत्ता अपनाई है।" वे दलित समुदाय से आते हैं और बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। भारत के पहले बौद्ध और दूसरे दलित सीजेआई के रूप में उनका कार्यकाल सामाजिक न्याय के मुद्दों पर केंद्रित रहा। गवई ने कहा कि सोशल मीडिया पर फैलाई गई गलत खबरें और एआई जनरेटेड क्लिप्स ने इस विवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी गलत सूचनाएं समाज को बांट सकती हैं।
गवई ने राजनीति में आने की अटकलों पर भी बोलते हुए कहा कि वे रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल या राज्यसभा सदस्य जैसे किसी सरकारी पद को स्वीकार नहीं करेंगे। वे सामाजिक कार्यों में समय देना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने राजनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए। उन्होंने कहा, "राजनीति में कदम रखने की संभावना पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन फिलहाल मेरा फोकस न्याय और समानता पर है।" यह बयान ऐसे समय आया जब कई लोग उनके राजनीतिक भविष्य पर चर्चा कर रहे थे।
साक्षात्कार के दौरान गवई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में सरकार ने कभी फोन नहीं किया या दबाव नहीं डाला। "न संसद सर्वोच्च है, न न्यायपालिका। सर्वोच्च सिर्फ संविधान है।" उन्होंने जजों को सरकार की मर्जी से काम न करने की सलाह दी। गवई ने हेट स्पीच को रोकने के लिए संसद से ठोस कानून बनाने की अपील की। कहा, "हेट स्पीच समाज को बांटती है। इसे रोकना जरूरी है।" वे सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ ट्रोलिंग से सतर्क हो गए। घटना के बाद उन्होंने सार्वजनिक टिप्पणियों में सावधानी बरती।
गवई का कार्यकाल कई महत्वपूर्ण फैसलों से चिह्नित रहा। उन्होंने वक्फ कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई, ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम को रद्द किया और पर्यावरणीय मंजूरी पर पोस्ट-फैक्टो फैसले की अनुमति दी। बुलडोजर न्याय पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) का समर्थन करते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर इसके कट्टर समर्थक थे। गोवा में इसका एक रूप पहले से मौजूद है। आरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति में क्रीमी लेयर की अवधारणा लानी चाहिए, ताकि लाभ एक ही परिवारों तक सीमित न रहे।
महिलाओं की न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व पर गवई ने चिंता जताई। उन्होंने कोलेजियम सिस्टम का बचाव किया, लेकिन सुधार की जरूरत बताई। कहा कि जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए। न्यायिक भ्रष्टाचार पर संसद की जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि आरोपों की जांच तेज होनी चाहिए। कोर्ट के आदेशों का क्रियान्वयन कार्यपालिका पर निर्भर है।
यह घटना पूरे देश में बहस का विषय बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गवई से बात की और हमले की निंदा की। कहा कि हर भारतीय गुस्से में है। सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल और असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने इसे न्यायपालिका पर हमला बताया। ओवैसी ने कहा कि अगर आरोपी का नाम असद होता, तो कार्रवाई अलग होती। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने किशोर को तुरंत निलंबित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसे अदालत की अवमानना कहा। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने पर विचार किया।
गवई की मां डॉ. कमल गवई ने कहा कि ऐसी घटनाएं देश में अराजकता फैला सकती हैं। पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने जजों को कोर्ट में कम बोलने की सलाह दी। हरिश साल्वे ने मीडिया को दोष देते हुए कहा कि सोशल मीडिया का हस्तक्षेप कोर्ट की गरिमा को प्रभावित कर रहा है। यह घटना न्यायिक इतिहास की पहली ऐसी घटना थी, जिसने जाति, धर्म और न्याय की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए।
गवई ने अपने 40 साल के करियर पर संतुष्टि जताई। कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना है। वे 9 फरवरी 1949 को नागपुर में जन्मे। बौद्ध परिवार से हैं और डॉ. अंबेडकर के अनुयायी। 1986 में बॉम्बे हाई कोर्ट में वकील बने। 2001 में नागपुर बेंच के जज बने। 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। 24 अगस्त 2025 को सीजेआई बने। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन प्रभावशाली। जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर को 53वें सीजेआई के रूप में शपथ ली।
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