2026 में AI के दौर में नौकरी के कम चांस वाले कोर्स- करियर चुनते समय सावधानी बरतें, ये क्षेत्र हो रहे प्रभावित।
AI और टेक्नोलॉजी के तेज विकास के साथ जॉब मार्केट में बड़े बदलाव आ रहे हैं। कई नई नौकरियां पैदा हो रही हैं, जबकि कुछ पारंपरिक क्षेत्रों में जॉब्स
AI और टेक्नोलॉजी के तेज विकास के साथ जॉब मार्केट में बड़े बदलाव आ रहे हैं। कई नई नौकरियां पैदा हो रही हैं, जबकि कुछ पारंपरिक क्षेत्रों में जॉब्स कम हो रही हैं। ऐसे में कोर्स चुनते समय भविष्य की मांग को ध्यान में रखना जरूरी हो गया है। कुछ कोर्स ऐसे हैं जहां एम्प्लॉयबिलिटी रेट अच्छा है, लेकिन कुछ में नौकरी के अवसर सीमित हो रहे हैं। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, ओवरऑल एम्प्लॉयबिलिटी 56.35 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो पिछले साल से बेहतर है। हालांकि, कुछ स्ट्रीम्स में यह रेट कम है और AI के प्रभाव से आगे चुनौतियां बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट में इंजीनियरिंग और आईटी से जुड़े कोर्स जैसे बी.टेक और कंप्यूटर साइंस में एम्प्लॉयबिलिटी 70 से 80 प्रतिशत तक है, जबकि नॉन-आईटी क्षेत्रों में यह कम दिख रही है।
नॉन-आईटी साइंस कोर्स जैसे सामान्य बी.एससी में एम्प्लॉयबिलिटी पहले की तुलना में कम हो रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसे ग्रेजुएट्स को जॉब मिलने की दर 58 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन स्पेशलाइजेशन के बिना यह और कम हो सकती है। AI के कारण डेटा एनालिसिस, रिसर्च और बेसिक साइंस रोल्स में ऑटोमेशन बढ़ रहा है, जिससे प्योर साइंस ग्रेजुएट्स को अतिरिक्त स्किल्स जैसे डेटा साइंस या बायोटेक स्पेशलाइजेशन की जरूरत पड़ रही है। अगर सिर्फ जनरल साइंस कोर्स किया जाए तो जॉब मार्केट में कॉम्पिटिशन अधिक और अवसर कम हो सकते हैं। इसी तरह एमबीए की एम्प्लॉयबिलिटी में गिरावट देखी गई है, जो पहले उच्च थी लेकिन अब कुछ स्पेशलाइजेशन को छोड़कर कम हो रही है। AI टूल्स बिजनेस एनालिसिस और मैनेजमेंट टास्क्स को हैंडल कर रहे हैं, जिससे ट्रेडिशनल एमबीए ग्रेजुएट्स को डिजिटल या AI आधारित स्किल्स जोड़नी पड़ रही हैं।
AI के प्रभाव से एंट्री-लेवल टेक जॉब्स भी कम हो रहे हैं, खासकर नॉन-स्पेशलाइज्ड इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के लिए। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रिपिटिटिव टास्क्स वाली जॉब्स जैसे बेसिक कोडिंग, डेटा एंट्री या सिस्टम एडमिन रोल्स AI से प्रभावित हैं। भारत में ग्रेजुएट एम्प्लॉयबिलिटी ओवरऑल 42 से 56 प्रतिशत के बीच है, लेकिन स्किल गैप के कारण कई डिग्री धारक अंडरएम्प्लॉयड हैं या जॉब्स नहीं मिल रही हैं। AI स्किल्स जैसे मशीन लर्निंग, क्लाउड और डेटा एनालिटिक्स वाली जॉब्स बढ़ रही हैं, जबकि ट्रेडिशनल फील्ड्स में कमी आ रही है। कुछ रिपोर्ट्स में जनरल ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी केवल 42.6 प्रतिशत बताई गई है, जहां थ्योरी बेस्ड एजुकेशन की वजह से इंडस्ट्री मैच नहीं हो रहा।
जॉब मार्केट में बदलाव के कारण कोर्स चुनते समय स्पेशलाइजेशन पर फोकस करना जरूरी है। नॉन-आईटी साइंस में अगर बायोलॉजी, केमिस्ट्री या फिजिक्स जैसे सब्जेक्ट्स बिना एप्लाइड स्किल्स के पढ़े जाएं तो आगे मुश्किल हो सकती है। रिपोर्ट्स में साइंस ड्रिवेन रोल्स में पोटेंशियल बताया गया है, लेकिन आईटी इंटीग्रेशन के बिना चांस कम हैं। इसी तरह कुछ ट्रेडिशनल डिग्रीज में स्किल्स गैप बड़ा है, जहां यूनिवर्सिटी करिकुलम इंडस्ट्री नीड्स से मैच नहीं कर रहा। AI के कारण ऑटोमेशन से रिपिटिटिव जॉब्स गायब हो रही हैं, जिससे ग्रेजुएट्स को अपस्किलिंग की जरूरत है। भारत में गिग वर्कफोर्स और प्रोजेक्ट बेस्ड हायरिंग बढ़ रही है, जहां स्किल सेंट्रिक एम्प्लॉयमेंट हो रहा है।
कुल मिलाकर, AI युग में नॉन-आईटी साइंस, जनरल एमबीए और कुछ ट्रेडिशनल कोर्स में नौकरी के चांस कम हो रहे हैं। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 में हाई एम्प्लॉयबिलिटी टेक और मैनेजमेंट में स्पेशलाइज्ड कोर्सेस के लिए है, जबकि नॉन-स्पेशलाइज्ड क्षेत्रों में गिरावट है। ग्रेजुएट्स को एआई, डेटा और डिजिटल स्किल्स जोड़कर तैयारी करनी चाहिए। जॉब मार्केट स्किल फर्स्ट हो रहा है, जहां डिग्री से ज्यादा प्रैक्टिकल नॉलेज मायने रखती है। ऐसे कोर्स जहां स्पेशलाइजेशन नहीं है, वहां आगे चुनौतियां बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट्स में महिलाओं की एम्प्लॉयबिलिटी पुरुषों से आगे निकलने की बात भी है, लेकिन ओवरऑल स्किल गैप बना हुआ है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल से कई सेक्टर्स में जॉब्स ट्रांसफॉर्म हो रही हैं। नॉन-आईटी साइंस ग्रेजुएट्स को स्पेशलाइजेशन जैसे बायोटेक या एनवायरनमेंटल साइंस में जाना चाहिए। एम्प्लॉयबिलिटी बढ़ाने के लिए इंडस्ट्री पार्टनरशिप और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग जरूरी है। 2026 में हायरिंग ट्रेंड्स स्किल बेस्ड हैं, जहां AI टूल्स यूज करने वाले कैंडिडेट्स को प्राथमिकता मिल रही है। ऐसे में पुराने कोर्सेस को अपडेट करना या अतिरिक्त स्किल्स सीखना आवश्यक हो गया है। जॉब क्राइसिस से बचने के लिए करियर चॉइस में फ्यूचर डिमांड देखें।
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