Bhadrapada Teej Chaturthi 2026: अगस्त के अंतिम सप्ताह में 3 बड़े व्रतों का संगम, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Bhadrapada Vrat 2026: अगस्त में कजरी तीज, बहुला चौथ और हेरंब संकष्टी चतुर्थी का दुर्लभ संयोग बन रहा है। जानिए शुभ मुहूर्त, तीनों व्रतों का धार्मिक महत्व और नियम।

Aug 30, 2026 - 11:39
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Bhadrapada Teej Chaturthi 2026: अगस्त के अंतिम सप्ताह में 3 बड़े व्रतों का संगम, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व
Bhadrapada Teej Chaturthi Vrat 2026
  • Bhadrapada Vrat 2026: भाद्रपद में बना दुर्लभ संयोग, एक ही तिथि चक्र में पड़ेंगे कजरी तीज, बहुला चौथ और संकष्टी चतुर्थी व्रत
  • भाद्रपद में अद्भुत संयोग: अगस्त में एक साथ जुड़ेंगे 3 बड़े व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा का सटीक समय
  • Bhadrapada Vrat 2026: भाद्रपद कृष्ण पक्ष में कजरी तीज और चतुर्थी व्रतों का महासंयोग, पंचांग के अनुसार तिथि व मुहूर्त जारी

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की शुरुआत के साथ ही सनातन धर्म में व्रत एवं साधना का विशेष काल प्रारंभ हो जाता है। वर्ष 2026 के अगस्त माह के अंतिम सप्ताह में तिथियों की विशिष्ट गणना के चलते कजरी तीज, बहुला चतुर्थी (बहुला चौथ) और हेरंब संकष्टी चतुर्थी का एक अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी संगम बन रहा है। अखंड सौभाग्य, संतान की दीर्घायु और विघ्नों के नाश की कामना से रखे जाने वाले ये तीनों व्रत लगातार तिथियों में पड़ रहे हैं, जिससे धार्मिक दृष्टि से यह समय बेहद फलदायी माना जा रहा है। देश भर के श्रद्धालु, विशेषकर महिलाएं, शिव-पार्वती, भगवान श्रीगणेश और गोमाता के पूजन की विशेष तैयारियों में जुट गई हैं। पंचांगीय गणनाओं के आधार पर ज्योतिषाचार्यों ने पूजा के सटीक मुहूर्त और पारण के नियम निर्धारित किए हैं।

हिंदू पंचांग में भाद्रपद माह को साधना, तप और व्रत के लिहाज से अत्यंत पावन माना जाता है। अगस्त 2026 के समापन काल में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया और चतुर्थी तिथियों का ऐसा संयोग बना है, जिसके अंतर्गत तीन प्रमुख व्रत—कजरी तीज (बड़ी तीज), बहुला चौथ और संकष्टी चतुर्थी—एक के बाद एक पड़ रहे हैं। कजरी तीज सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु और वैवाहिक सुख-शांति के लिए रखी जाती है। वहीं, बहुला चौथ पर संतान की रक्षा और परिवार की समृद्धि के लिए गाय एवं बछड़े की उपासना की जाती है। इसके साथ ही प्रथम पूज्य भगवान गणेश को समर्पित संकष्टी चतुर्थी का व्रत जीवन के समस्त संकटों के निवारण के लिए रखा जाता है। इन तीनों महत्वपूर्ण अनुष्ठानों का एक साथ आना धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष फलदायी माना जा रहा है।

तीनों व्रतों का संक्षिप्त परिचय एवं मुख्य उद्देश्य

  1. कजरी तीज (तृतीया तिथि): भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना, अखंड सौभाग्य और सुखद दांपत्य जीवन की प्राप्ति का पर्व।

  2. बहुला चौथ (चतुर्थी तिथि - दिन का पूजन): भगवान श्रीकृष्ण और कामधेनु स्वरूप गाय-बछड़े का वंदन, संतान के आरोग्य व वंश रक्षा की कामना।

  3. हेरंब संकष्टी चतुर्थी (चतुर्थी तिथि - चंद्रोदय व्यापिनी): विघ्नहर्ता भगवान गणेश का व्रत, संकटों के निवारण व ज्ञान-समृद्धि की प्राप्ति के लिए चंद्र अर्घ्य पूजन।

पंचांगीय गणना के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का प्रभाव समाप्त होते ही चतुर्थी तिथि का प्रवेश हो रहा है। तृतीया तिथि के दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर माता नीमड़ी और शिव-पार्वती की पारंपरिक पूजा-अर्चना संपन्न करती हैं। इस दिन संध्या काल में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करने की प्राचीन परंपरा है। उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस पर्व को बड़ी तीज अथवा सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है, जहां सत्तू के विभिन्न पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है।

जैसे ही तृतीया तिथि का समापन होकर चतुर्थी का आरंभ होता है, उसी चक्र में बहुला चौथ का विधान प्रारंभ हो जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं मिट्टी से बने गाय और बछड़े की प्रतिमाओं अथवा प्रत्यक्ष रूप से गोवंश की पूजा करती हैं। इस व्रत में चाकू से कटी हुई सब्जियों या अनाजों का सेवन वर्जित माना जाता है। इसके पश्चात उसी शाम को चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय के समय हेरंब संकष्टी चतुर्थी का पूजन आरंभ होता है, जिसमें गणेश जी को दूर्वा, मोदक और तिल के लड्डू अर्पित कर चंद्रमा को जल का अर्घ्य दिया जाता है। इस प्रकार दो ही दिनों के भीतर तीन बड़े अनुष्ठानों की शृंखला पूर्ण होती है।

प्रमुख ज्योतिषाचार्यों और पंचांग निर्माताओं का कहना है कि भाद्रपद के कृष्ण पक्ष में जब तृतीया और चतुर्थी तिथियां परस्पर जुड़ती हैं, तो साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। विद्वानों के अनुसार, इस कालखंड में ग्रहों की स्थिति भी अत्यंत शुभ योगों का निर्माण कर रही है, जिससे तपस्या और दान-पुण्य का अक्षय फल प्राप्त होता है। आचार्यों ने परामर्श दिया है कि व्रतियों को तिथियों के मान और चंद्रोदय के सही समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि किसी भी अनुष्ठान के नियमों में त्रुटि न हो।

वहीं, स्थानीय बाजारों और धार्मिक स्थलों पर भी इस महासंयोग को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। पूजा सामग्री, शृंगार के सामान, फल, सत्तू और गोपूजन से संबंधित वस्तुओं की मांग में तेजी आई है। मंदिरों में विशेष भजन-कीर्तन और कथा वाचन के प्रबंध किए जा रहे हैं।

इन तीनों पावन व्रतों के एक साथ आने से समाज में आध्यात्मिक चेतना और पारिवारिक सौहार्द का माहौल बना है। कजरी तीज जहां दांपत्य जीवन में निष्ठा और प्रेम का संदेश देती है, वहीं बहुला चौथ पर्यावरण और पशुधन (विशेषकर गोवंश) के संरक्षण का गहरा सामाजिक संदेश प्रसारित करती है। संकष्टी चतुर्थी के माध्यम से व्यक्ति अपने मानसिक तनाव और विघ्नों से मुक्ति पाने का आत्मिक संबल प्राप्त करता है।

ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी इलाकों में पारंपरिक लोकगीतों और कजरी गायन की गूंज सुनाई देने लगी है। महिलाएं सामूहिक रूप से नीमड़ी माता की स्थापना कर पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन कर रही हैं, जिससे सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊर्जा मिलती है।

आगामी दिनों में इन व्रतों के संपन्न होने के साथ ही भाद्रपद मास के अन्य महापर्वों का मार्ग प्रशस्त होगा। संकष्टी चतुर्थी के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य दिवस यानी श्री कृष्ण जन्माष्टमी, अजा एकादशी और फिर शुक्ल पक्ष की हरतालिका तीज व गणेश चतुर्थी की तैयारियां गति पकड़ेंगी। श्रद्धालुओं को सलाह दी गई है कि वे अपने क्षेत्र के स्थानीय चंद्रोदय समय की पुष्टि करके ही व्रत का पारण करें और गो-सेवा तथा अन्न दान जैसे सत्कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लें।

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