UP News: मदरसा शिक्षक वेतन संशोधन विधेयक योगी सरकार ने लिया वापस, जानिए क्या था अखिलेश यादव सरकार का यह फैसला

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अखिलेश यादव के कार्यकाल में पारित मदरसा शिक्षक वेतन विधेयक को विधानमंडल से वापस ले लिया है। जानें क्या है पूरा विवाद।

Aug 6, 2026 - 12:54
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UP News: मदरसा शिक्षक वेतन संशोधन विधेयक योगी सरकार ने लिया वापस, जानिए क्या था अखिलेश यादव सरकार का यह फैसला
  • मदरसा शिक्षक वेतन विधेयक योगी सरकार ने वापस लिया, जानिए क्या था विवाद और अखिलेश यादव से जुड़ा मामला
  • मदरसा शिक्षकों के वेतन विधेयक पर योगी सरकार का बड़ा फैसला, वापस लिया अखिलेश यादव सरकार के समय का प्रस्ताव
  • यूपी विधानमंडल से मदरसा शिक्षक वेतन संशोधन विधेयक वापस, योगी सरकार ने समाप्त किया अखिलेश काल का कानून

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में पारित किए गए मदरसा शिक्षक-कर्मचारी वेतन संशोधन विधेयक को औपचारिक रूप से वापस ले लिया है। विधानमंडल के दोनों सदनों यानी विधानसभा और विधानपरिषद से इस आशय का प्रस्ताव पारित कराकर योगी सरकार ने इस वर्षों पुराने कानूनी ढांचे के अध्याय को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। राज्य सरकार के इस कदम को समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के राजनीतिक फैसलों पर एक और बड़े प्रहार के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने और अनुदानित मदरसों के वित्तीय प्रबंधन में सुधार लाने के उद्देश्य से उठाए गए इस कदम के बाद अब राज्य में मदरसा शिक्षकों के मानदेय और नियुक्ति संबंधी नए दिशानिर्देशों पर काम तेज होने की संभावना है।

उत्तर प्रदेश विधानमंडल के सत्र के दौरान राज्य सरकार ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान तैयार किए गए 'उत्तर प्रदेश राज्य अरबी और फारसी मदरसा मान्यता तथा सेवा नियमावली' से जुड़े वेतन संशोधन विधेयक को वापस लेने का प्रस्ताव सदन के पटल पर रखा। दोनों सदनों में ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई, जिसके बाद यह विधेयक आधिकारिक रूप से निरस्त हो गया।

इस विधेयक को वापस लिए जाने के बाद समाजवादी पार्टी सरकार के समय बनाए गए उस कानून का अंत हो गया है, जिसके तहत मान्यता प्राप्त मदरसों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन भुगतान का उत्तरदायित्व पूरी तरह राज्य सरकार के खजाने पर डालने का प्रावधान तैयार किया गया था। शासन का मानना है कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए पारित किया गया यह विधेयक कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण से कई विसंगतियों से भरा हुआ था।

यह पूरा मामला वर्ष 2016 से जुड़ा हुआ है, जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। चुनावी वर्ष से ठीक पहले अखिलेश सरकार ने गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसों के शिक्षकों और कर्मचारियों को राज्य सरकार के खजाने से वेतन भुगतान के दायरे में लाने का निर्णय लिया था। इसके लिए विधानमंडल से उत्तर प्रदेश मदरसा (शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) विधेयक पारित कराया गया था।

हालांकि, वर्ष 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तो इस विधेयक की कानूनी समीक्षा की गई। शासन की जांच में पाया गया कि इस विधेयक में कई तकनीकी कमियां थीं और यह राज्य के वित्त पर भारी वित्तीय बोझ डाल रहा था। इसके अलावा, राज्य सरकार ने राज्य में संचालित मदरसों के आधुनिकीकरण और पारदर्शी प्रबंधन के लिए एक नई नीति पर काम करना शुरू किया। इसी कड़ी में विधेयक को निरस्त करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसे अब विधानमंडल के दोनों सदनों से पारित कराकर अंतिम रूप दे दिया गया है।

विधेयक वापस लिए जाने के फैसले पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह निर्णय पारदर्शी व्यवस्था और वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक था। सरकार का पक्ष है कि मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सही पारदर्शी तंत्र सुनिश्चित करना प्राथमिक उद्देश्य है, न कि बिना किसी मानक के सरकारी खजाने पर अनुचित वित्तीय बोझ डालना।

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। विपक्ष का आरोप है कि योगी सरकार जानबूझकर अखिलेश यादव सरकार के जनहितकारी फैसलों को रद्द कर रही है। सपा नेताओं का कहना है कि मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन की व्यवस्था से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई थी और इस विधेयक को वापस लेकर सरकार ने उनके भविष्य को अधर में लटका दिया है। मुस्लिम संगठनों और मदरसा संचालकों ने भी इस कदम पर चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक नीति बनाने की मांग की है।

इस विधेयक के वापस लिए जाने से उत्तर प्रदेश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। प्रशासनिक दृष्टिकोण से, अब गैर-सरकारी और अनुदानित मदरसों के शिक्षकों के वेतन ढांचे में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सरकार अब मदरसों के वित्तीय प्रबंधन के लिए नए मानक लागू करने की स्थिति में आ गई है।

राजनीतिक रूप से, यह फैसला समाजवादी पार्टी के 'एम-वाई' (मुस्लिम-यादव) समीकरण से जुड़े पुराने फैसलों को बदलने की भाजपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इस फैसले के बाद प्रदेश के हजारों मदरसा शिक्षकों के मन में अपने भविष्य और वित्तीय सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता का माहौल बन सकता है। इसके साथ ही, मदरसा शिक्षा बोर्ड में चल रहे सुधार कार्यक्रमों को भी एक नई दिशा मिलेगी।

विधेयक के पूरी तरह निरस्त होने के बाद अब अल्पसंख्यक कल्याण विभाग मदरसा व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए नए दिशा-निर्देश तैयार कर सकता है। माना जा रहा है कि सरकार केवल उन्हीं मदरसों को सहायता या वित्तीय अनुदान देने पर विचार करेगी जो पूरी तरह से तय मानकों, आधुनिकीकरण के नियमों और पारदर्शी प्रक्रियाओं का पालन करेंगे।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर विधानसभा के अंदर और सड़कों पर विपक्षी दलों का विरोध देखने को मिल सकता है। मदरसा शिक्षक संघों द्वारा इस फैसले के खिलाफ कानूनी विकल्प तलाशने या शासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी की जा रही है। सरकार का अगला कदम यह स्पष्ट करेगा कि वह मदरसा शिक्षकों के मानदेय और रोजगार सुरक्षा के लिए क्या नई पारदर्शी नीति सामने लाती है।

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