बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का विवादित बयान: PoK की तरह सिलहट, चटगांव और नोआखली को भारत में मिलाने की उठाई मांग
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा है कि PoK की तरह अब बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह, सिलहट और नोआखली को वापस लेने का समय आ गया है। जानें उनके इस बयान के मायने और राजनीतिक प्रतिक्रिया।

- 'इतिहास सुधारने का आ गया समय', निशिकांत दुबे बोले- जैसे PoK लेंगे, वैसे ही बांग्लादेश के चटगांव-सिलहट वापस लाएं
- बांग्लादेश के हालातों के बीच निशिकांत दुबे का बड़ा बयान, पूर्वोत्तर सुरक्षा के लिए चटगांव बंदरगाह को भारत में शामिल करने की पैरवी
- 'चटगांव, सिलहट और नोआखली पर भी दावा करे भारत', सांसद निशिकांत दुबे के बयान से गरमाई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय राजनीति
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे ने पड़ोसी देश बांग्लादेश और भारत की ऐतिहासिक सीमाओं को लेकर एक बयान देकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। झारखंड के गोड्डा से लोकसभा सांसद दुबे ने कहा है कि अब इतिहास की गलतियों को सुधारने का समय आ चुका है। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जिस तरह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को वापस भारत में मिलाने की बात की जा रही है, उसी तरह पूर्वोत्तर की सुरक्षा और ऐतिहासिक संदर्भों को देखते हुए बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह, सिलहट और नोआखली को भी वापस लिया जाना चाहिए।
निशिकांत दुबे का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा और पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं।
- सांसद का तर्क और पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी
अपने बयान में भाजपा सांसद ने 1947 के विभाजन और उसके बाद की भू-राजनीतिक स्थितियों का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि विभाजन के समय असम और बंगाल के कई रणनीतिक व सांस्कृतिक रूप से जुड़े हिस्सों को अनुचित तरीके से अलग किया गया था। दुबे ने कहा कि चटगांव बंदरगाह ऐतिहासिक रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (विशेषकर त्रिपुरा, मिजोरम और असम) के लिए समुद्री व्यापार का सबसे स्वाभाविक मार्ग था। इसके अलग होने के कारण पूर्वोत्तर का पूरा क्षेत्र मुख्य भूमि से केवल एक संकरे 'सिलीगुड़ी कॉरिडोर' (चिकन्स नेक) के भरोसे रह गया। उन्होंने दावा किया कि भारत को अपनी सामरिक सुरक्षा और ऐतिहासिक दावों को नए सिरे से परिभाषित करना चाहिए। सांसद निशिकांत दुबे का यह बयान सीधे तौर पर एक संप्रभु राष्ट्र के भू-भाग से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
आधिकारिक तौर पर भारत और बांग्लादेश के बीच 2015 में ऐतिहासिक 'भूमि सीमा समझौता' (Land Boundary Agreement) लागू हो चुका है, जिसके तहत दोनों देशों ने सीमांकन और एन्क्लेव के आदान-प्रदान को अंतिम रूप दिया था। भारत सरकार की आधिकारिक विदेश नीति पड़ोसी देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करने पर आधारित रही है। विपक्षी दलों ने इस तरह के बयानों को गैर-जिम्मेदाराना करार देते हुए कहा है कि किसी सत्तारूढ़ दल के सांसद द्वारा दूसरे देश के क्षेत्रों पर ऐसा दावा करना द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्र की स्थिरता के लिए नुकसानदेह हो सकता है। फिलहाल, विदेश मंत्रालय या केंद्र सरकार की ओर से सांसद के इस व्यक्तिगत बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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