Technology: देखिये दुनिया का पहला कैमरा जो शरीर के अंदर की भी फोटो खींच सकता है, जानिए क्या है टेक्नोलॉजी।
वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है जो चिकित्सा जगत में क्रांति ला सकती है। यह दुनिया का पहला Perovskite आधारित Camera है, जो शरीर के अंदर की तस्वीरें ले सकता
वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है जो चिकित्सा जगत में क्रांति ला सकती है। यह दुनिया का पहला Perovskite आधारित Camera है, जो शरीर के अंदर की तस्वीरें ले सकता है। अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी और चीन की सूचो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर बनाया गया यह डिटेक्टर सिंगल फोटॉन एमिशन कंप्यूटेड टोमोग्राफी (SPECT) इमेजिंग के लिए इस्तेमाल होता है। यह Camera गामा किरणों को पकड़कर शरीर के अंदर के अंगों की स्पष्ट तस्वीरें देता है। पारंपरिक मशीनों से यह तेज, सस्ता और सुरक्षित है। शोध 21 सितंबर 2025 को नेचर फोटोनिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ। इस तकनीक से कैंसर, हृदय रोग और अन्य बीमारियों का जल्दी पता चल सकेगा। डॉक्टरों को अब महंगे उपकरणों की जरूरत कम पड़ेगी।
Perovskite एक विशेष प्रकार का क्रिस्टल मटेरियल है, जो सूर्य की रोशनी को बिजली में बदलने के लिए जाना जाता है। 2012 में नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमिलियानोस कनाटजिडिस ने पहली बार Perovskite से सोलर सेल बनाए थे। उसी टीम ने 2013 में खोजा कि ये क्रिस्टल एक्स-रे और गामा किरणों को भी पकड़ सकते हैं। लेकिन अब तक इन्हें चिकित्सा इमेजिंग में इस्तेमाल करना मुश्किल था। नई खोज में शोधकर्ताओं ने क्रिस्टल को पिक्सलेटेड सेंसर की तरह डिजाइन किया। यह स्मार्टफोन कैमरे के पिक्सल्स जैसा काम करता है। प्रत्येक पिक्सल गामा किरण को अलग-अलग पकड़ता है, जिससे तस्वीरें तेज और साफ होती हैं। यिहुई हे, जो कनाटजिडिस के पूर्व पोस्टडॉक्टोरल फेलो हैं, ने इस सेंसर का डिजाइन तैयार किया। उन्होंने मल्टी-चैनल रीडआउट इलेक्ट्रॉनिक्स को ऑप्टिमाइज किया और हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग टेस्ट किए।
SPECT इमेजिंग न्यूक्लियर मेडिसिन का एक तरीका है। इसमें रेडियोएक्टिव ट्रेसर इंजेक्ट किए जाते हैं, जो शरीर के अंदर घूमते हैं। गामा किरणें निकलती हैं, जिन्हें डिटेक्टर पकड़ता है। इससे हृदय की पंपिंग, रक्त प्रवाह या छिपी बीमारियों का पता चलता है। पुरानी मशीनें सोडियम आयोडाइड (NaI) या कैडमियम जिंक टेलुराइड (CZT) पर चलती हैं। NaI सस्ती है लेकिन तस्वीरें धुंधली आती हैं। CZT साफ तस्वीरें देती है लेकिन महंगी और जटिल है। Perovskite Camera दोनों की कमियों को दूर करता है। इसका एनर्जी रेजोल्यूशन 3.5 प्रतिशत है, जो CZT से बेहतर है। यह सिंगल फोटॉन को पकड़ सकता है, जिससे इमेजिंग तेज होती है। शोधकर्ताओं ने लैब टेस्ट में दिखाया कि यह पारंपरिक डिटेक्टर्स से 10 गुना तेज काम करता है।
यह तकनीक कैसे काम करती है? Perovskite क्रिस्टल को विशेष तरीके से उगाया जाता है। सतह को इंजीनियरिंग से मजबूत बनाया जाता है। फिर इसे पिक्सल्स में काटा जाता है। जब गामा किरण क्रिस्टल से टकराती है, तो वह इलेक्ट्रिक सिग्नल पैदा करती है। इलेक्ट्रॉनिक्स इस सिग्नल को पढ़ते हैं और कंप्यूटर तस्वीर बनाता है। यह प्रक्रिया इतनी सटीक है कि डॉक्टर शरीर के गहरे हिस्सों को देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, कैंसर सेल्स या हृदय की नसों को स्पष्ट दिखा सकता है। कनाटजिडिस कहते हैं, "यह माइलस्टोन है। Perovskite अब लैब से बाहर आ रही है।" हे ने कहा, "यह स्वास्थ्य के लिए सीधी मदद देगी।" इस Camera से स्कैन समय कम हो जाएगा, जो मरीजों के लिए आरामदायक है।
चिकित्सा में इसका असर बड़ा होगा। दुनिया भर में SPECT स्कैन सालाना करोड़ों बार होते हैं। लेकिन महंगे उपकरणों के कारण कई जगहों पर पहुंच नहीं है। यह नया Camera सस्ता होने से गांवों और छोटे अस्पतालों तक पहुंचेगा। इससे कैंसर का जल्दी पता चलेगा। हृदय रोगियों की जांच आसान होगी। न्यूक्लियर मेडिसिन को सुरक्षित बनाएगा, क्योंकि कम रेडिएशन की जरूरत पड़ेगी। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अन्य इमेजिंग तकनीकों जैसे PET को भी सुधार सकता है। अर्जोन नेशनल लैबोरेटरी में कनाटजिडिस सीनियर साइंटिस्ट हैं। उनकी टीम ने क्रिस्टल ग्रोथ पर काम किया। हे ने डिवाइस डिजाइन और टेस्टिंग संभाली। यह सहयोग से बनी खोज है।
Perovskite की खोज पुरानी है। 1839 में जर्मन वैज्ञानिक लेविन वॉन हाइबनर ने इसका नाम दिया। लेकिन हाल के वर्षों में यह सोलर सेल्स में लोकप्रिय हुई। 2009 से इफिशिएंसी बढ़ रही है। अब मेडिकल इमेजिंग में एंट्री हो रही है। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वीनबर्ग कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज में कनाटजिडिस चार्ल्स ई. एंड एम्मा एच. मॉरिसन प्रोफेसर हैं। हे अब इंडिपेंडेंट रिसर्चर हैं। टीम ने कहा कि यह तकनीक कमर्शियल होने की कगार पर है। कंपनियां इसे बनाने की योजना बना रही हैं। इससे हॉस्पिटल्स में बदलाव आएगा।
यह खोज अन्य क्षेत्रों में भी मदद करेगी। सिक्योरिटी स्कैनिंग में इस्तेमाल हो सकती है। पर्यावरण निगरानी के लिए भी। लेकिन मुख्य फोकस हेल्थकेयर पर है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह न्यूक्लियर मेडिसिन को लोकतांत्रिक बनाएगा। गरीब देशों में भी उपलब्ध होगा। भारत जैसे देशों में जहां कैंसर केस बढ़ रहे हैं, वहां फायदा होगा। डॉक्टरों को अब धुंधली तस्वीरों से जूझना नहीं पड़ेगा। मरीजों को कम समय लगेगा। रेडिएशन का खतरा कम होगा। यह तकनीक भविष्य की है।
शोध पत्र में विस्तार से बताया गया है। क्रिस्टल को 3D प्रिंटिंग जैसे तरीके से शेप दिया गया। सतह को कोटिंग से स्थिर बनाया। टेस्ट में गामा किरणों को 511 केवी पर पकड़ा। रिजोल्यूशन 0.5 मिलीमीटर तक सटीक। पारंपरिक से बेहतर। टीम ने फैंटम मॉडल पर टेस्ट किया, जो मानव शरीर की नकल है। परिणाम शानदार आए। अब क्लिनिकल ट्रायल की बारी है। अगर सफल रहा, तो 2-3 साल में बाजार में आएगा।
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