'चन्नी SC, आशू ब्राह्मण और मैं जट्ट...', पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर रंधावा ने चन्नी को सीएम चेहरा बनाने की मांग का किया समर्थन
पंजाब कांग्रेस में सीएम चेहरे को लेकर अंदरूनी कलह तेज। पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर रंधावा ने चन्नी, आशू और खुद का हवाला देकर सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला रखा।

- Punjab Congress Rift: चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम चेहरा बनाने की मांग तेज, सुखजिंदर रंधावा ने हाईकमान को दिया संदेश
- पंजाब कांग्रेस में सीएम चेहरे पर नया सियासी घमासान: सुखजिंदर रंधावा ने चन्नी और आशू के साथ मिलकर पेश किया नया समीकरण
- पंजाब कांग्रेस में हलचल: रंधावा ने पंजाब कांग्रेस में सीएम चेहरे को लेकर दिया सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला
पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस की प्रदेश इकाई में नेतृत्व और मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। लुधियाना में आयोजित एक संयुक्त बैठक के दौरान पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व मंत्री भारत भूषण आशू की मौजूदगी में पार्टी हाईकमान को सीधा संदेश दिया। रंधावा ने सामाजिक समीकरणों का हवाला देते हुए चन्नी को दोबारा मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए जाने की वकालत की और दावा किया कि दलित, जट्ट सिख और हिंदू ब्राह्मण का यह संयुक्त नेतृत्व ही पंजाब में पार्टी को चुनावी मजबूती प्रदान कर सकता है। इस बयान के बाद प्रदेश कांग्रेस के विभिन्न गुटों में सियासी हलचल तेज हो गई है।
पंजाब कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक फेरबदल के बाद से जारी असंतोष अब शक्ति प्रदर्शन और नेतृत्व के दावों में तब्दील होता दिख रहा है। लुधियाना में पार्टी के तीन प्रमुख चेहरों पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा और पूर्व कैबिनेट मंत्री भारत भूषण आशू ने एक साथ मंच साझा किया।
इस दौरान सुखजिंदर सिंह रंधावा ने मीडिया से बात करते हुए साफ तौर पर कहा कि पार्टी को चरणजीत सिंह चन्नी जैसा अनुभवी चेहरा ही आगे रखना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि चन्नी के पास सरकार चलाने का शीर्ष अनुभव है और वे राज्य के सबसे बड़े सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। रंधावा ने कहा कि चन्नी दलित समुदाय से हैं, वे खुद जट्ट सिख हैं और आशू ब्राह्मण वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मिलकर एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग संतुलन बनाते हैं।
पंजाब कांग्रेस में कलह की पृष्ठभूमि हाल ही में पार्टी संगठन द्वारा गठित चुनाव समितियों और प्रदेश अध्यक्ष पद पर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को बरकरार रखे जाने के बाद से लगातार गहरा रही है। चन्नी खेमा लंबे समय से उन्हें पार्टी का मुख्य चेहरा अथवा प्रदेश संगठन की कमान सौंपने की मांग करता रहा है। इससे पूर्व पटियाला में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान भी चन्नी समर्थकों ने खुलकर नारेबाजी की थी और मंच से चन्नी को आगे लाने के नारे लगाए थे, जिससे कार्यक्रम में अफरा-तफरी मच गई थी।
लुधियाना में रंधावा दोनों नेताओं के कंधों पर हाथ रखकर खड़े हुए और उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को यह संदेश देने का प्रयास किया कि जमीनी स्तर पर वरिष्ठ नेताओं की तिकड़ी पूरी तरह एकजुट है। रंधावा ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकारों में इन सभी नेताओं ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं, इसलिए चुनावी वैतरणी पार करने के लिए इस प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक संतुलन की अनदेखी नहीं की जा सकती।
चन्नी समर्थक नेताओं का कहना है कि चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के जनमानस में एक लोकप्रिय और सर्वस्वीकार्य चेहरा हैं तथा उनके कार्यकाल के जनहितकारी फैसलों का व्यापक असर आज भी जनता के बीच है। रंधावा के इस बयान को चन्नी खेमे के लिए एक बड़े राजनीतिक समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा के खेमे से जुड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी में सामूहिक नेतृत्व की परंपरा रही है। प्रदेश नेतृत्व का तर्क है कि चुनाव से पहले किसी एक व्यक्ति को प्रोजेक्ट करने के बजाय संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। पार्टी के कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि नेतृत्व से जुड़े सभी नीतिगत फैसले कांग्रेस आलाकमान के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और सार्वजनिक मंचों पर इस तरह की बयानबाजी से कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
सुखजिंदर सिंह रंधावा द्वारा पेश किए गए इस त्रिस्तरीय फॉर्मूले ने पंजाब की राजनीति में जातिगत और क्षेत्रीय समीकरणों की बहस को दोबारा गरमा दिया है। पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग बत्तीस प्रतिशत है, जबकि जट्ट सिख और हिंदू मतदाताओं की भी चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका रहती है।
इस बयान से पार्टी के भीतर गुटबाजी खुलकर सतह पर आ गई है। एक तरफ जहां मौजूदा प्रदेश नेतृत्व संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व मंत्रियों का यह संयुक्त धड़ा हाईकमान पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसका सीधा असर आगामी चुनावी रणनीतियों और टिकट वितरण के संतुलन पर पड़ना तय माना जा रहा है।
पंजाब कांग्रेस में गहराते इस मतभेद को सुलझाने के लिए गेंद अब कांग्रेस आलाकमान और प्रदेश प्रभारी के पाले में है। आने वाले दिनों में दिल्ली में वरिष्ठ नेताओं की केंद्रीय नेतृत्व के साथ बैठक होने की संभावना है।
हाईकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी गुटों को एकजुट रखने और चुनावी साल में अंतर्कलह को थामने की होगी। पार्टी नेतृत्व को यह तय करना होगा कि क्या वे चुनाव से पहले किसी चेहरे की घोषणा करेंगे या फिर सभी वर्गों को साधते हुए सामूहिक नेतृत्व के आधार पर ही मैदान में उतरेंगे।
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