Elon Musk vs Mukesh Ambani: मस्क ने अंबानी पर बोला सीधा हमला, तो राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर साधा निशाना
एलन मस्क द्वारा सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटन पर मुकेश अंबानी पर सवाल उठाने के बाद राहुल गांधी ने पीएम मोदी और अंबानी के रिश्तों पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है।

- सैटेलाइट स्पेक्ट्रम पर एलन मस्क का बड़ा बयान: राहुल गांधी ने उठाया क्रोनी कैपिटलिज्म का मुद्दा, उद्योग जगत में हलचल
- Musk Ambani Spectrum Row: मस्क और अंबानी के टकराव में राहुल गांधी की एंट्री, एक्स पर कसा तीखा तंज
- Satellite Internet Spectrum: मस्क के बयान पर राहुल गांधी का पलटवार, अंबानी-मोदी संबंधों पर फिर उठाए सवाल
नई दिल्ली: भारत में तेजी से उभर रहे सैटेलाइट ब्रॉडबैंड और अंतरिक्ष संचार (Satellite Spectrum) बाजार को लेकर दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के बीच छिड़ी कारोबारी जंग अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गई है। स्पेसएक्स (SpaceX) और स्टारलिंक (Starlink) के प्रमुख एलन मस्क द्वारा भारतीय सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर मुकेश अंबानी पर सीधा हमला बोलने के तुरंत बाद कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया। राहुल गांधी ने मस्क के बयान को आधार बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति मुकेश अंबानी के कथित कारोबारी गठजोड़ और 'क्रोनी कैपिटलिज्म' पर तीखा प्रहार किया है।
मस्क और अंबानी के बीच यह खींचतान उस समय तेज हुई जब स्टारलिंक की भारत में एंट्री और सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के आवंटन के तौर-तरीकों पर दोनों दिग्गज उद्योगपतियों के विचार आमने-सामने आ गए। राहुल गांधी लंबे समय से केंद्र सरकार पर चुनिंदा उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाते रहे हैं, और मस्क के ताजा बयान ने उनके इन आरोपों को एक बार फिर मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में ला खड़ा किया है।
- मस्क ने अंबानी पर क्या कहा और विवाद की जड़ क्या है?
विवाद का मुख्य केंद्र भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम का आवंटन है। एलन मस्क की कंपनी 'स्टारलिंक' और सुनील भारती मित्तल समर्थित 'वनवेब' (OneWeb) लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का आवंटन वैश्विक मानकों (ITU गाइडलाइंस) के तहत प्रशासनिक आवंटन (Administrative Allocation) के जरिए किया जाना चाहिए, न कि खुली नीलामी (Auction) से।
दूसरी तरफ, भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायंस जियो (Reliance Jio) और उसके प्रमुख मुकेश अंबानी का कड़ा रुख रहा है कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की भी पारंपरिक टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की तरह ही खुली और प्रतिस्पर्धी नीलामी होनी चाहिए। जियो का तर्क रहा है कि नीलामी न होने से विदेशी कंपनियों को अनुचित लाभ मिलेगा और लेवल प्लेइंग फील्ड खत्म हो जाएगा।
इसी पृष्ठभूमि में एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर टिप्पणी करते हुए मुकेश अंबानी के रुख पर तीखा एतराज जताया। मस्क ने संकेत दिया कि नीलामी की मांग प्रतिस्पर्धा को रोकने और घरेलू बाजार पर एकाधिकार बनाए रखने का प्रयास है। मस्क के इस अप्रत्याशित और सीधे हमले ने भारतीय व्यापारिक जगत में हलचल मचा दी।
- राहुल गांधी का तीखा हमला: 'अंबानी-मोदी रिश्तों' पर उठाए सवाल
एलन मस्क के बयान के सामने आते ही राहुल गांधी ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर केंद्र की एनडीए सरकार को घेरने में तनिक भी देर नहीं की। राहुल गांधी ने कहा कि जो बात वह वर्षों से देश की जनता को समझाने की कोशिश कर रहे थे, आज वही बात दुनिया के शीर्ष उद्योगपति भी सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि:
एकाधिकार को संरक्षण: केंद्र सरकार देश के प्रमुख संसाधनों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और डिजिटल बुनियादी ढांचे को कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट्स के हाथों में केंद्रित कर रही है।
प्रतिस्पर्धा का गला घोंटना: खुली और निष्पक्ष वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बाधित कर केवल घरेलू दिग्गजों के व्यावसायिक हितों को साधने के लिए नीतियां गढ़ी जा रही हैं।
उपभोक्ताओं का नुकसान: यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सस्ती और आधुनिक तकनीक को रोका जाएगा, तो अंततः देश के आम उपभोक्ताओं को महंगे डेटा और सीमित विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
राहुल गांधी ने अपने बयान में दोहराया कि भारत किसी एक या दो उद्योगपतियों की निजी जागीर नहीं है और देश के हर संसाधन पर आम नागरिकों का अधिकार होना चाहिए।
केंद्र सरकार और दूरसंचार विभाग (DoT) का आधिकारिक रुख
इस पूरे विवाद पर सरकार का रुख नए दूरसंचार अधिनियम (Telecommunications Act) के इर्द-गिर्द घूमता है। केंद्रीय संचार मंत्रालय और दूरसंचार नियामक 'ट्राई' (TRAI) ने पहले ही स्पष्ट किया है कि कानून के अनुसार सैटेलाइट ब्रॉडबैंड स्पेक्ट्रम का आवंटन प्रशासनिक तौर पर किया जाएगा, लेकिन इसके लिए उपयुक्त शुल्क और नियम तय किए जाएंगे।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि स्पेक्ट्रम का प्रशासनिक आवंटन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है क्योंकि सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी साझा (Shared) प्रकृति की होती है, जिसे पारंपरिक मोबाइल स्पेक्ट्रम की तरह किसी एक ऑपरेटर को एक्सक्लूसिव तौर पर नहीं बेचा जा सकता। हालांकि, रिलायंस जियो ने इस पर अपनी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं और कहा है कि अगर वॉयस और डेटा सेवाएं दी जा रही हैं, तो नियम सभी के लिए समान होने चाहिए।
भारतीय बाजार के लिए इस टकराव के क्या मायने हैं?
भारत का सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर का होने का अनुमान है। खासकर देश के सुदूर ग्रामीण, पर्वतीय और पूर्वोत्तर के इलाकों में जहां फाइबर केबल और मोबाइल टावर पहुंचाना बेहद खर्चीला और कठिन है, वहां सैटेलाइट इंटरनेट गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
मस्क की स्टारलिंक: अंतरिक्ष में हजारों लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स के जरिए सीधे छतों पर लगे रिसीवर तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाती है।
जियो और एयरटेल की तैयारी: रिलायंस जियो ने भी लक्जमबर्ग की एसईएस (SES) के साथ साझेदारी कर अपनी सैटेलाइट सेवा 'जियो स्पेस फाइबर' तैयार की है, जबकि भारती एयरटेल 'यूटेलसैट वनवेब' के साथ मैदान में है।
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि मस्क के सीधे हमले और राहुल गांधी के राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद अब सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम और मूल्य निर्धारण पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।
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