IAS Durga Shakti Nagpal Contempt Case: सिविल जज को फोन कर दबाव बनाने का आरोप, हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना के दिए निर्देश

IAS Durga Shakti Nagpal Contempt Case: सिविल जज को फोन कर दबाव बनाने के आरोप में आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना का आदेश दिया।

Aug 24, 2026 - 13:55
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IAS Durga Shakti Nagpal Contempt Case: सिविल जज को फोन कर दबाव बनाने का आरोप, हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना के दिए निर्देश
  • आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल पर चलेगा अवमानना केस: इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा- जज को फोन करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार
  • IAS दुर्गा शक्ति नागपाल की बढ़ीं मुश्किलें: गोंडा भूमि विवाद में जज को फोन करने पर इलाहाबाद HC सख्त, आपराधिक अवमानना का मामला
  • IAS Durga Shakti Nagpal: महिला जज को फोन कर धमकाने और दबाव बनाने के आरोप में आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल पर आपराधिक अवमानना का केस

उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और देवीपाटन मंडल की आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। गोंडा सिविल कोर्ट में तीन दशक से लंबित नजूल भूमि विवाद की सुनवाई कर रहीं सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान को फोन कर कथित तौर पर प्रभावित करने और अनुचित दबाव बनाने के मामले को अदालत ने गंभीरता से लिया है। न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी की एकल पीठ ने प्रथमदृष्टया इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार मानते हुए मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की सुनवाई वाली सक्षम पीठ के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस आदेश के बाद प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। 

गोंडा जिले में करीब तीस साल पुराने एक भूमि विवाद से जुड़े मुकदमे की सुनवाई कर रही न्यायिक अधिकारी को फोन करके प्रशासनिक प्रभाव दिखाने के आरोपों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त संज्ञान लिया है। सिविल जज शबीना खान द्वारा जिला जज को भेजी गई आधिकारिक शिकायत में आरोप लगाया गया कि देवीपाटन मंडल की कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें अवकाश के दौरान फोन कर पद का रौब दिखाया और सुनवाई को लेकर अनुचित दबाव डालने का प्रयास किया। उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी मुकदमे में पक्षकार या प्रशासनिक अधिकारी द्वारा पीठासीन न्यायाधीश को सीधे फोन कर प्रभावित करने की कोशिश न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप है। 

यह पूरा विवाद ज्योति विद्या मंदिर स्कूल और नगर पालिका परिषद गोंडा के बीच वर्ष 1997 से चल रहे एक नियमित दीवानी मुकदमे से जुड़ा हुआ है। विवादित जमीन नजूल भूमि है, जो अभिलेखों में देवीपाटन मंडल आयुक्त के नाम दर्ज है और जिस पर स्कूल भवन निर्माण को लेकर वाद साक्ष्य के चरण में लंबित है। स्कूल प्रबंधन ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर निचली अदालत पर दबाव बना रहे हैं, इसलिए इस मुकदमे को जिले से बाहर किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए।

याचिका पर सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सिविल जज शबीना खान ने 4 अगस्त को जिला जज गोंडा को लिखित पत्र भेजकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी थी। पत्र के अनुसार, 15 जुलाई को जब वह अवकाश पर थीं, तब कमिश्नर दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें फोन किया और छुट्टी की अवधि को लेकर सवाल करने के साथ कथित तौर पर कहा कि वे एक सीनियर आईएएस अधिकारी हैं और फोन न उठाकर उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया है। जज ने आरोप लगाया कि उन्हें डराने और उच्च न्यायालय में शिकायत करने की चेतावनी देकर दबाव बनाने का प्रयास किया गया। इसके बाद जिला जज ने संबंधित मुकदमे को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया। 

हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से यह स्वीकार किया गया कि कमिश्नर ने न्यायिक अधिकारी को फोन किया था, लेकिन बातचीत का उद्देश्य केवल यह जानना था कि पीठासीन अधिकारी कब तक अवकाश पर रहेंगी क्योंकि जमीन पर कमिश्नर कार्यालय भवन का निर्माण प्रस्तावित है। कमिश्नर की ओर से स्पष्ट किया गया कि उनका इरादा अदालत की कार्यवाही को प्रभावित करने का नहीं था और न ही फोन पर मुकदमे के गुण-दोष पर कोई चर्चा की गई।

वहीं उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी के पत्र में दर्ज बातचीत की भाषा और लहजे से स्पष्ट आभास मिलता है कि अदालत पर दबाव डालने की चेष्टा की गई थी। पीठ ने टिप्पणी की कि अधीनस्थ अदालतों को किसी भी प्रकार के अपमान, धमकी या अनुचित दबाव से सुरक्षित रखना उच्च न्यायालय का संवैधानिक दायित्व है ताकि न्यायाधीश निर्भीक होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। 

इस मामले के सामने आने के बाद कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच के शक्ति संतुलन और मर्यादा को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई है। न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक पदों पर आसीन शीर्ष अधिकारियों द्वारा अदालती मामलों में इस तरह का सीधा संवाद न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है। इस अदालती आदेश से यह स्पष्ट संदेश गया है कि किसी भी स्तर का नौकरशाह अदालत की स्वतंत्रता और पीठासीन अधिकारियों की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशानुसार, मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश से प्रशासनिक अनुमोदन प्राप्त करने के बाद इस पत्रावली को आपराधिक अवमानना मामलों की सुनवाई करने वाली उपयुक्त खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा। अवमानना अदालत द्वारा मामले की मेरिट के आधार पर नोटिस जारी किए जाने और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से औपचारिक जवाब तलब किए जाने की संभावना है। इसके साथ ही मूल भूमि विवाद से जुड़े मुकदमे की सुनवाई अब गोंडा की संबंधित नई अदालत में नियमानुसार आगे बढ़ेगी।

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