Raksha Bandhan Special: अहमदाबाद के मिल्लतनगर में 85 वर्षीय ख़ातून बीबी और मुस्लिम महिलाएं तैयार कर रहीं प्यार की डोर, पेश की सद्भाव की नजीर
Raksha Bandhan: गुजरात के अहमदाबाद स्थित मिल्लतनगर में 85 वर्षीय ख़ातून बीबी और अन्य मुस्लिम महिलाएं दशकों से भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के लिए राखियां बना रही हैं।

- Communal Harmony on Raksha Bandhan: 85 साल की ख़ातून बीबी का जज्बा, अहमदाबाद के मिल्लतनगर में मुस्लिम महिलाएं बना रहीं राखियां
- Ahmedabad Rakhi Making News: उम्र 85 साल पर नहीं थमे हाथ, अहमदाबाद के मिल्लतनगर में गंगा-जमुनी तहजीब की डोर पिरो रहीं ख़ातून बीबी
- उम्र 85 साल लेकिन आज भी बनाती हैं राखियां: अहमदाबाद के मिल्लतनगर में मुस्लिम महिलाओं ने पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल
गुजरात के अहमदाबाद शहर का मिल्लतनगर इलाका इन दिनों सामाजिक सौहार्द और अटूट प्रेम की खूबसूरत तस्वीर पेश कर रहा है। रक्षाबंधन पर्व के मद्देनजर यहां के दर्जनों मुस्लिम परिवारों में दिन-रात सुंदर और आकर्षक राखियां बनाने का काम पूरे उत्साह से चल रहा है। इस पूरी रिवायत का सबसे प्रेरणादायक चेहरा 85 वर्षीय ख़ातून बीबी हैं, जिन्होंने ढलती उम्र और कमजोर होती नजरों के बावजूद रेशमी धागों में प्यार पिरोने का यह सिलसिला टूटने नहीं दिया है। पिछले कई दशकों से इस हुनर से जुड़ीं ख़ातून बीबी और इलाके की सैकड़ों महिलाएं घर-घर बैठकर रक्षा सूत्र तैयार कर रही हैं। यह न केवल उनकी आजीविका का जरिया है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब का जीता-जागता प्रमाण भी है।
अहमदाबाद के मिल्लतनगर की संकरी गलियों में इन दिनों सुबह से लेकर देर रात तक रंग-बिरंगे धागों, मोतियों, सितारों और गोटेदार पट्टियों की चमक फैली हुई है। त्योहार के नजदीक आते ही यहां का माहौल किसी बड़े कारखाने जैसा नजर आने लगता है, जहां घर के बरामदों और आंगनों में महिलाएं समूह बनाकर राखियां तैयार करने में जुटी हैं।
इस पूरी गतिविधि के केंद्र में हैं 85 साल की बुजुर्ग ख़ातून बीबी। जिंदगी के आठ दशक से ज्यादा गुजार चुकीं ख़ातून बीबी के चेहरे की झुर्रियों के पीछे एक दृढ़ संकल्प झलकता है। उम्र के इस पड़ाव पर जहां अधिकांश लोग आराम की तलाश करते हैं, वहीं ख़ातून बीबी पूरी तन्मयता से सुई-धागा थामकर बेहद बारीक और नक्काशीदार राखियां बनाती हैं। उनका कहना है कि जब तक उनकी सांसें और हाथ चल रहे हैं, वे इस पवित्र डोर को बनाना बंद नहीं करेंगी।
सद्भाव और स्वावलंबन का संगम
85 वर्ष की उम्र में भी ख़ातून बीबी रोजाना घंटों बैठकर बनाती हैं खूबसूरत राखियां।
मिल्लतनगर के कई मुस्लिम घरों में तीन पीढ़ियों से चल रहा है राखी निर्माण का कार्य।
तैयार की गई राखियां गुजरात के अलावा देश के विभिन्न राज्यों के बाजारों में होती हैं सप्लाई।
मिल्लतनगर में राखी बनाने की यह परंपरा कोई नई नहीं है, बल्कि यह सिलसिला कई दशकों पुराना है। ख़ातून बीबी ने अपनी जवानी के दिनों में घर के आर्थिक हालात को सहारा देने और अपने खाली समय का सदुपयोग करने के लिए राखी बनाने का काम सीखा था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने परिवार की अन्य बहुओं, बेटियों और पड़ोस की महिलाओं को भी यह हुनर सिखाया। आज हालात यह हैं कि इस पूरे मोहल्ले के लगभग हर दूसरे घर में महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों को संभालने के साथ-साथ इस मौसमी कुटीर उद्योग से जुड़ी हुई हैं।
रक्षाबंधन से करीब तीन-चार महीने पहले ही स्थानीय व्यापारी और थोक विक्रेता इन महिलाओं को कच्चा माल जैसे रेशम के धागे, स्पंज, मोती, जरी, कुंदन और डिजाइनर पैच उपलब्ध करा देते हैं। इसके बाद शुरू होता है कारीगरी का अद्भुत दौर। मिल्लतनगर की ये महिलाएं अपने हाथों से पारंपरिक धागा राखी, बच्चों के कार्टून वाली राखी और डिजाइनर ब्रेसलेट राखी तैयार करती हैं। ख़ातून बीबी इस काम में अपनी बेटियों और पोतियों का मार्गदर्शन करती हैं और खुद भी हर दिन दर्जनों राखियां तैयार करती हैं।
ख़ातून बीबी का कहना है कि मजहब कभी भी दिलों के रिश्ते के बीच दीवार नहीं बनता। उनका मानना है कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं है, बल्कि यह एक बहन की अपने भाई के लिए दुआ और हिफाजत का अहसास है। जब कोई बहन अपने भाई की कलाई पर उनकी बनाई राखी बांधती होगी, तो उस खुशी में उनकी दुआएं भी शामिल होती हैं। वे इसे सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि ऊपर वाले की इबादत जैसा नेक काम मानती हैं।
इलाके की अन्य युवा और मध्यम आयु वर्ग की मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि ख़ातून बीबी उनके लिए प्रेरणा की मिसाल हैं। इस काम से उन्हें घर बैठे सम्मानजनक आमदनी मिल जाती है, जिससे वे अपने बच्चों की पढ़ाई और त्योहारों के खर्चे पूरे करती हैं। स्थानीय हिंदू व्यापारियों का कहना है कि मिल्लतनगर की महिलाओं द्वारा बनाई गई राखियों की फिनिशिंग और डिजाइन की मांग बाजार में सबसे ज्यादा होती है। यह साझा कारोबार दोनों समुदायों के बीच आपसी भरोसे और भाईचारे को साल-दर-साल और मजबूत करता है।
मिल्लतनगर से निकलने वाला यह भाईचारे का संदेश आज के दौर में बेहद महत्वपूर्ण है। यह कहानी दर्शाती है कि भारत के आम जनमानस में सामाजिक समरसता की जड़ें कितनी गहरी हैं। राजनीतिक और सामाजिक बहसों से दूर, जमीनी हकीकत यह है कि लोग एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में न केवल शरीक होते हैं बल्कि एक-दूसरे की खुशियों को सजाने में अहम भूमिका भी निभाते हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पहल महिला सशक्तिकरण और स्थानीय कुटीर उद्योग का भी बेहतरीन उदाहरण है। घर की चारदीवारी में रहकर स्वावलंबी बनने की यह कोशिश अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होता है और पारंपरिक हस्तशिल्प कला को जीवित रखने में मदद मिलती है।
मिल्लतनगर में तैयार की गई राखियों की यह खेप अब अहमदाबाद के थोक बाजारों से होते हुए गुजरात के विभिन्न शहरों और देश के अन्य हिस्सों में भेजी जा रही है। स्थानीय कारीगरों की मांग है कि सरकार और खादी ग्रामोद्योग जैसे संगठन इन महिला कारीगरों को सीधे वित्तीय प्रोत्साहन और डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएं ताकि बिचौलियों के बिना उन्हें अपनी मेहनत का और बेहतर मेहनताना मिल सके।
ख़ातून बीबी जैसी बुजुर्ग महिलाएं आने वाली पीढ़ी को यह सिखा रही हैं कि हुनर, मेहनत और इंसानियत की कोई उम्र या सीमा नहीं होती। जब तक ऐसे हाथ स्नेह और विश्वास के धागे पिरोते रहेंगे, तब तक भारत की साझी संस्कृति और विविधता में एकता का ताना-बाना यूं ही मजबूत बना रहेगा।
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