Gen Z and Gen Alpha Concept: 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' पश्चिमी अवधारणा, भारत से कोई लेना-देना नहीं: हिमंत बिस्वा सरमा
Himanta Biswa Sarma on Gen Z: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि जेन जी और जेन अल्फा पश्चिमी अवधारणाएं हैं, जिनका भारतीय समाज से कोई लेना-देना नहीं है।

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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने आधुनिक समाज में पीढ़ियों के वर्गीकरण को लेकर चल रही शब्दावली पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 'जेन जी' (Gen Z) और 'जेन अल्फा' (Gen Alpha) जैसी श्रेणियां अमेरिका और यूरोप की पश्चिमी अवधारणाएं हैं और भारतीय परिवेश या समाज से इनका कोई वास्तविक लेना-देना नहीं है। मुख्यमंत्री ने यह बात युवाओं, आधुनिक संस्कृति और सामाजिक संरचना पर चर्चा के दौरान कही। उनका तर्क है कि भारत की सामाजिक बनावट और पारिवारिक मूल्य पश्चिमी देशों से पूरी तरह भिन्न हैं, इसलिए पश्चिमी समाजशास्त्रीय पैमानों को जबरन भारतीय युवाओं पर नहीं थोपा जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक पीढ़ी को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
आधुनिक विमर्श और सोशल मीडिया पर युवाओं को अलग-अलग श्रेणियों जैसे 'मिलेनियल्स', 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' में बांटने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। इसी संदर्भ में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विभाजन भारतीय सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं है। उनके अनुसार, यह पूरी तरह से पश्चिमी समाज, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर गढ़ा गया विचार है।
मुख्यमंत्री का मानना है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें संयुक्त परिवार, पारस्परिक सम्मान और साझा संस्कारों पर आधारित हैं। ऐसे में उम्र के आधार पर पश्चिमी तरीके से पीढ़ियों का लेबल लगाना न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि यह हमारे पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को पश्चिमी नजरिए से देखने की भूल है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संदर्भ में सभी युवा देश के विकास और अपनी समृद्ध संस्कृति के समान संवाहक हैं।
एक सार्वजनिक संबोधन और संवाद के दौरान जब युवाओं के दृष्टिकोण और नई पीढ़ी के तौर-तरीकों को लेकर सवाल उठे, तब मुख्यमंत्री ने इस वर्गीकरण पर अपना दृष्टिकोण रखा। उन्होंने विस्तार से बताया कि पश्चिमी देशों में सामाजिक और पारिवारिक ढांचे के टूटने तथा पूंजीवादी व्यवस्था के तहत उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने के लिए जनसांख्यिकीय वर्गीकरण (डेमोग्राफिक सेगमेंटेशन) किए जाते हैं। वहां बाजार की जरूरतों के अनुसार 'बेबी बूमर्स', 'जेन एक्स', 'जेन वाई', 'जेन जी' और अब 'जेन अल्फा' जैसे शब्दों का चलन बढ़ा।
हिमंत बिस्वा सरमा ने रेखांकित किया कि भारत में सदियों से पीढ़ीगत निरंतरता की परंपरा रही है, जहां नई पीढ़ी अपने बड़ों के अनुभव और परंपराओं से सीखकर आगे बढ़ती है। उन्होंने कहा कि भारतीय युवाओं की अपनी विशिष्ट पहचान, आकांक्षाएं और चुनौतियां हैं। उन्हें पश्चिमी चश्मे से देखकर 'जेन जी' या 'जेन अल्फा' का ठप्पा लगाने के बजाय हमें उन्हें अपनी जड़ों, मूल्यों और राष्ट्र निर्माण की प्राथमिकताओं से जोड़ना चाहिए।
मुख्यमंत्री के इस बयान के सामने आते ही विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक तबकों से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद के पैरोकारों ने मुख्यमंत्री के रुख का समर्थन किया है। उनका कहना है कि पश्चिमी सामाजिक शब्दावलियों को आंख मूंदकर स्वीकार करने से हमारी अपनी सांस्कृतिक समझ कमजोर होती है और भारत के युवाओं को अपनी मौलिक पहचान पर गर्व करना चाहिए।
दूसरी तरफ, समाजशास्त्रियों और आधुनिक विचारकों के एक वर्ग का तर्क है कि वैश्वीकरण और डिजिटल क्रांति के इस दौर में तकनीक का प्रभाव सीमाओं से परे है। इंटरनेट, स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ बड़े हो रहे दुनिया भर के युवाओं में कई समानताएं हैं, इसलिए इन वैश्विक संज्ञाओं का उपयोग केवल एक निश्चित आयु वर्ग के तकनीकी व सामाजिक व्यवहार को समझने के लिए समाजशास्त्र में किया जाता है, न कि सांस्कृतिक मूल्यों को चोट पहुंचाने के लिए। वहीं, विपक्षी दलों ने इसे ध्यान भटकाने वाला राजनीतिक बयान करार दिया है।
हिमंत बिस्वा सरमा के इस बयान ने डिजिटल दौर में सांस्कृतिक स्वायत्तता और पहचान के मुद्दे को फिर से विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारतीय समाज को वैश्विक ट्रेंड्स और पश्चिमी शब्दावलियों को उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए या फिर अपनी स्थानीय वास्तविकताओं के आधार पर युवाओं की सामाजिक समझ विकसित करनी चाहिए।
इस बयान का असर सोशल मीडिया पर भी व्यापक रूप से देखा जा रहा है, जहां युवा खुद अपने विचारों, जीवनशैली और भारतीय परंपराओं के साथ अपने जुड़ाव पर खुलकर लिख रहे हैं। यह बहस केवल शब्दावली तक सीमित न रहकर भारतीय पारिवारिक मूल्यों बनाम पश्चिमी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के व्यापक फलक तक फैल रही है।
इस बयान के बाद आने वाले दिनों में युवा नीतियों, शिक्षा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भारतीय मूल्यों के समावेश को लेकर चर्चाएं और गहरी होने की उम्मीद है। असम सरकार और कई सामाजिक संगठन युवाओं को स्थानीय विरासत, भाषा और इतिहास से जोड़ने के लिए नए अभियानों की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं।
वैचारिक स्तर पर यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विमर्श राष्ट्रीय स्तर पर अन्य नेताओं और विचारकों के बीच भी गति पकड़ता है। तेजी से बदलते डिजिटल युग में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखते हुए आधुनिकता के साथ सामंजस्य बैठाना आने वाले समय में भारतीय नीति-निर्माताओं और समाज के लिए एक प्रमुख विषय बना रहेगा।
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