G-20: दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति रामफोसा ने अमेरिका की खाली कुर्सी को सौंपी 2026 की मेजबानी, ट्रंप के बहिष्कार पर तनाव चरम पर
रामफोसा ने बहिष्कार की घोषणा के तुरंत बाद केप टाउन में पत्रकारों से कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका नहीं आ रहा। लेकिन बहिष्कार कभी कामयाब नहीं होते। उनकी अनुप
जोहान्सबर्ग। दक्षिण अफ्रीका में आयोजित ऐतिहासिक G-20 शिखर सम्मेलन के दूसरे और अंतिम दिन रविवार को एक अनोखा क्षण देखने को मिला। मेजबान राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने परंपरागत हैंडओवर समारोह में अमेरिकी प्रतिनिधि के लिए रखी गई खाली कुर्सी को G-20 की 2026 की मेजबानी सौंप दी। यह प्रतीकात्मक कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बहिष्कार के कारण उठाया गया, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका पर सफेद किसानों के खिलाफ हिंसा के झूठे आरोप लगाते हुए पूरे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को सम्मेलन से दूर रखा। रामफोसा ने कहा कि वे खाली कुर्सी को सौंपना नहीं चाहते थे, लेकिन अमेरिका की अनुपस्थिति ने इसे मजबूरी बना दिया। इस घटना ने वैश्विक आर्थिक मंच पर अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के बीच तनाव को नई ऊंचाई दे दी।
यह सम्मेलन 22 और 23 नवंबर 2025 को जोहान्सबर्ग के नासरेक एक्सपो सेंटर में हुआ। यह अफ्रीकी महाद्वीप पर पहली बार G-20 शिखर सम्मेलन था, जिसका थीम था 'सॉलिडैरिटी, इक्वालिटी एंड सस्टेनेबिलिटी' यानी एकजुटता, समानता और स्थिरता। दक्षिण अफ्रीका ने विकासशील देशों की चिंताओं को प्राथमिकता दी, जैसे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वित्तीय सहायता, गरीब देशों का कर्ज माफी और अमीरों पर कर लगाने जैसे मुद्दे। लेकिन अमेरिका का बहिष्कार पूरे आयोजन पर साया बन गया। ट्रंप ने मई 2025 में व्हाइट हाउस में रामफोसा से मुलाकात के दौरान ही दक्षिण अफ्रीका पर सफेद किसानों के नरसंहार के निराधार दावे किए थे। इन दावों को दक्षिण अफ्रीकी सरकार और कई अफ्रीकनर समुदायों ने खारिज किया है। ट्रंप ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका सफेद अल्पसंख्यकों को सताता है, इसलिए अमेरिका सम्मेलन का बहिष्कार करेगा।
रामफोसा ने बहिष्कार की घोषणा के तुरंत बाद केप टाउन में पत्रकारों से कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका नहीं आ रहा। लेकिन बहिष्कार कभी कामयाब नहीं होते। उनकी अनुपस्थिति उनकी हानि है।" उन्होंने जोर दिया कि G-20 बिना अमेरिका के भी चलेगा और महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे। सम्मेलन के दौरान अमेरिका ने दबाव डाला कि कोई संयुक्त घोषणा पत्र जारी न किया जाए, क्योंकि वे इसमें शामिल नहीं हैं। लेकिन रामफोसा ने शनिवार को सम्मेलन की शुरुआत में ही घोषणा कर दी कि सभी सदस्यों ने सहमति से 30 पेज का घोषणा पत्र अपनाया है। इसमें जलवायु संकट, असमानता, युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में शांति और विकासशील देशों के लिए सहायता पर जोर दिया गया। रामफोसा के प्रवक्ता विंसेंट मगवेन्या ने कहा, "यह घोषणा पुनर्विचार योग्य नहीं है। महीनों की मेहनत का नतीजा है।"
हैंडओवर समारोह पर विवाद और गहरा गया। G-20 की परंपरा है कि हर सम्मेलन के अंत में मेजबान अगले देश को प्रतीकात्मक रूप से गेवल सौंपता है। अमेरिका ने प्रस्ताव दिया कि उनका चार्ज डी अफेयर्स, मार्क डी. डिलार्ड, जोहान्सबर्ग में समारोह में हिस्सा लेगा। लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने इसे ठुकरा दिया। विदेश मंत्री रोनाल्ड लमोला ने कहा, "राष्ट्रपति रामफोसा किसी जूनियर राजनयिक को सौंपना नहीं चाहते। हम अमेरिकी राष्ट्रपति को ही देना पसंद करेंगे।" व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने इसे "फर्जी खबर" कहा और रामफोसा पर "मुंह चलाने" का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका केवल औपचारिक समारोह के लिए आएगा, चर्चाओं में नहीं। लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने साफ कर दिया कि खाली कुर्सी को ही सौंपा जाएगा। रामफोसा ने कहा, "मैं खाली कुर्सी को सौंपना नहीं चाहता, लेकिन वह कुर्सी वहां होगी।"
यह विवाद ट्रंप और रामफोसा के बीच पुराने मतभेदों का परिणाम है। मई 2025 में व्हाइट हाउस में हुई बैठक में ट्रंप ने रामफोसा को सफेद किसानों के कथित नरसंहार के वीडियो दिखाए, जो गलत साबित हुए। रामफोसा ने तथ्यों से सुधारने की कोशिश की, लेकिन ट्रंप ने अनसुना कर दिया। ट्रंप ने बाद में कहा कि दक्षिण अफ्रीका G-20 के योग्य नहीं है और वे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को भेजने वाले थे, लेकिन अंत में पूर्ण बहिष्कार कर दिया। दक्षिण अफ्रीका ने इसे "बुलिंग" बताया। रामफोसा ने कहा, "हम धमकियों से नहीं डरेंगे।" सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के व्लादिमीर पुतिन भी अनुपस्थित थे, लेकिन उनके प्रतिनिधि मौजूद थे।
सम्मेलन में 19 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं, यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ के प्रतिनिधि शामिल हुए। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के ओलाफ शोल्ज, भारत के नरेंद्र मोदी और ब्रिटेन के कीयर स्टार्मर जैसे नेता पहुंचे। मोदी ने रामफोसा को बधाई दी और विकासशील देशों की एकजुटता पर जोर दिया। सम्मेलन के साइडलाइन पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर विशेष सत्र हुआ। रामफोसा ने कहा कि लिंग आधारित हिंसा वैश्विक संकट है। महिलाओं के संगठन वुमन फॉर चेंज ने काला पहनकर विरोध प्रदर्शन किया।
घोषणा पत्र में कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं। यह अमीरों पर कर लगाने, जलवायु परिवर्तन के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर की सहायता और गरीब देशों के कर्ज पर छूट की मांग करता है। यूक्रेन, सूडान, कांगो और फिलिस्तीन में शांति पर जोर दिया गया। लेकिन अमेरिका ने जलवायु भाषा पर आपत्ति जताई, क्योंकि ट्रंप जलवायु परिवर्तन को मानव-जनित नहीं मानते। व्हाइट हाउस ने घोषणा को "शर्मनाक" कहा। रामफोसा ने कहा, "हमने सहमति से काम किया। अमेरिका की अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा।"
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहिष्कार अमेरिका की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाएगा। जोहान्सबर्ग स्थित राजनीतिक जोखिम सलाहकार मरिसा लोरेंको ने कहा, "यह विकासशील देशों को चीन और भारत जैसे अन्य देशों से करीब ला सकता है।" प्रोफेसर नार्निया बोहलर-मुलर ने कहा, "यह वैश्विक शासन में विविध नेतृत्व को बढ़ावा देगा।" 2026 का G-20 मियामी के ट्रंप नेशनल डोरल रिजॉर्ट में होगा। ट्रंप ने कहा कि वे एजेंडा को सरल बनाएंगे और कम विषयों पर चर्चा करेंगे।
रामफोसा ने समापन भाषण में कहा, "यह अफ्रीका का पहला G-20 था, जो वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करता है। हम सहयोग पर विश्वास करते हैं।" सम्मेलन ने दक्षिण अफ्रीका की कूटनीतिक क्षमता दिखाई। लेकिन अमेरिका के साथ संबंधों में सुधार जरूरी है, क्योंकि अमेरिका दक्षिण अफ्रीका का बड़ा व्यापारिक साझेदार है। रामफोसा ने कहा कि वे ट्रंप से बात करने को तैयार हैं। व्हाइट हाउस ने कहा कि ट्रंप G-20 की विश्वसनीयता बहाल करेंगे।
What's Your Reaction?