नेपाल के बाद उत्तराखंड पर मंडराया बाढ़ का संकट! 5.33 किमी पीछे खिसका खतलिंग ग्लेशियर, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

उत्तराखंड की भिलंगना घाटी में खतलिंग ग्लेशियर 5.33 किमी पीछे खिसक गया है। वाडिया संस्थान के नए शोध में ग्लेशियर झील फटने से बाढ़ के बड़े खतरे की चेतावनी दी गई है।

Aug 30, 2026 - 12:02
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नेपाल के बाद उत्तराखंड पर मंडराया बाढ़ का संकट! 5.33 किमी पीछे खिसका खतलिंग ग्लेशियर, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
Khatling Glacier retreat Uttarakhand
  • Uttarakhand Glacier Crisis: भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों पर बड़ा संकट, 5.33 किमी खिसका खतलिंग, मंडराया बाढ़ का खतरा 
  • Uttarakhand Flood Threat: वाडिया इंस्टीट्यूट का चौंकाने वाला खुलासा, खतलिंग ग्लेशियर तेजी से पिघला, बढ़ रही हिमनद झील 
  • Uttarakhand Glacier Threat: उत्तराखंड की भिलंगना घाटी में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर, खतलिंग 5.33 किमी खिसका, अलर्ट जारी 

नेपाल और तिब्बत सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण तबाही के बाद अब भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड में भी गंभीर खतरे की घंटी बज चुकी है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि टिहरी गढ़वाल की भिलंगना घाटी में स्थित प्रसिद्ध खतलिंग ग्लेशियर पिछले 5 दशकों के दौरान 5.33 किलोमीटर पीछे खिसक गया है। 1973 से 2025 तक के उपग्रह और जमीनी आंकड़ों के आधार पर प्रकाशित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि घाटी के ग्लेशियरों का बर्फीला द्रव्यमान तेजी से घट रहा है और ग्लेशियरों के मुहाने पर विशाल हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes) बन रही हैं। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि तापमान में निरंतर वृद्धि और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से भविष्य में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) यानी झील फटने से विनाशकारी बाढ़ का बड़ा संकट पैदा हो सकता है।

हिमालयी पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को लेकर वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन प्रस्तुत किया है। स्प्रिंगर के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध जर्नल रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित भिलंगना बेसिन के ग्लेशियरों में बर्फ घटने की रफ्तार वर्ष 2014 के बाद अत्यधिक तेज हो गई है। भिलंगना नदी का प्रमुख उद्गम स्रोत माना जाने वाला खतलिंग ग्लेशियर 1973 से 2024 के बीच अपने मूल स्थान से लगभग 5.33 किलोमीटर पीछे हट चुका है।

इसके साथ ही घाटी के सहायक ग्लेशियर फेटिंग, दूधगंगा, रतंगरियां, जोगिन और एक अनाम ग्लेशियर का क्षेत्रफल और बर्फीला आयतन भी तेजी से सिकुड़ रहा है। सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि पिघलते ग्लेशियरों के मुहाने पर पानी का विशाल भंडार जमा हो रहा है, जो कभी भी प्राकृतिक बांध टूटने पर निचले इलाकों में जल प्रलय ला सकता है।

भिलंगना बेसिन के प्रमुख ग्लेशियरों में आया बदलाव (1973–2024)

  1. खतलिंग ग्लेशियर: इसका सिरा 5.33 किमी पीछे खिसका और कुल क्षेत्रफल में 2.79 वर्ग किमी की भारी कमी आई।

  2. फेटिंग ग्लेशियर: 1.825 किमी पीछे खिसककर वर्ष 2000 के आसपास मुख्य खतलिंग ग्लेशियर से पूरी तरह अलग हो गया।

  3. झील का विस्तार: अनाम ग्लेशियर के मुहाने पर स्थित झील का क्षेत्रफल 0.23 वर्ग किमी से बढ़कर 0.36 वर्ग किमी हो गया, जबकि जल भराव 10.4 लाख घन मीटर से बढ़कर 1.074 करोड़ घन मीटर के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सर्मिष्ठा हलदर और डॉ. राकेश भांभरी के नेतृत्व में किए गए इस दीर्घकालिक शोध में पिछले पांच दशकों के ऐतिहासिक एरियल फोटोग्राफ, कोरोना सैटेलाइट डेटा, लैंडसैट इमेजरी और आधुनिक उच्च-रिजॉल्यूशन उपग्रह चित्रों का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया।

शोध के आंकड़ों के अनुसार, 1973 से 2001 के बीच खतलिंग ग्लेशियर के पीछे हटने की अधिकतम गति लगभग 150 मीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई थी। 2000 से 2014 के बीच रतंगरियां और जोगिन जैसे कुछ छोटे ग्लेशियरों में अस्थायी रूप से बर्फ का संतुलन सकारात्मक रहा था, लेकिन वर्ष 2014 के बाद से सभी ग्लेशियरों के द्रव्यमान में भारी गिरावट देखी जा रही है।

अध्ययन में पाया गया कि खतलिंग में सालाना 0.53 मीटर जल-समतुल्य (Water Equivalent) बर्फ पिघल रही है, जबकि अनाम ग्लेशियर में यह दर 0.92 मीटर और दूधगंगा में 0.88 मीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। लगातार पिघलने और मलबे (Debris) के जमाव के चलते हिमनदों के आगे प्राकृतिक मोरेन (मलबा-पत्थर) के पीछे पानी जमा होकर विशाल कृत्रिम झीलों का रूप ले रहा है। 

शोधकर्ताओं और भू-वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि (Global Warming) का असर अब गढ़वाल हिमालय के संवेदनशील ग्लेशियरों पर बेहद स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है।

भू-विज्ञान विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भिलंगना बेसिन का लगभग 19 प्रतिशत क्षेत्र पर्माफ्रॉस्ट (लगातार शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे जमा रहने वाली जमीन) के दायरे में आता है। जब यह पर्माफ्रॉस्ट पिघलता है, तो खड़ी पहाड़ी ढलानें ढीली पड़ जाती हैं, जिससे अचानक बड़े हिमस्खलन और चट्टानें गिरने का खतरा बढ़ जाता है।

स्थानीय पर्यावरणविदों और ग्रामीणों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि पिछले दो-तीन दशकों में ऊपरी इलाकों में बर्फबारी की अवधि घटी है, प्राकृतिक जलस्रोत अनियमित हुए हैं और मौसमी बारिश का चक्र पूरी तरह बदल चुका है।

खतलिंग और आसपास के ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल एक भौगोलिक घटना नहीं है, बल्कि यह निचले इलाकों के लिए एक बड़ा सुरक्षा संकट है। भिलंगना नदी सीधे जाकर टिहरी जलाशय में मिलती है, जिस पर 2400 मेगावाट की टिहरी जलविद्युत परियोजना और अन्य छोटी पनबिजली परियोजनाएं संचालित हैं।

यदि ग्लेशियर के सामने बन रही झीलें किसी हिमस्खलन या बादल फटने की घटना के कारण अचानक टूटती हैं, तो उत्पन्न होने वाली विशाल जलराशि (Flash Flood) और भारी मलबा निचले रिहायशी इलाकों, पुलों, सड़कों और जलविद्युत संरचनाओं को भारी क्षति पहुंचा सकता है। वैज्ञानिकों के मॉडलिंग आकलन के अनुसार, ऐसी किसी भी झील के फटने से लगभग 4377 क्यूमेक पानी का बहाव अत्यंत तीव्र गति से नीचे की ओर दौड़ सकता है। 

वैज्ञानिकों ने आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और नीति निर्माताओं को तत्काल कदम उठाने की सिफारिश की है। भिलंगना घाटी में बन रही संवेदनशील हिमनद झीलों की चौबीसों घंटे सैटेलाइट और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) के जरिए निगरानी जरूरी बताई गई है।

इसके साथ ही, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और मानवीय हस्तक्षेप पर कड़े नियम लागू करने तथा झीलों के मुहानों से नियंत्रित तरीके से जल निकासी (Siphoning) की तकनीकी योजना बनाने की आवश्यकता जताई गई है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित आपदा से समय रहते बचा जा सके।

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