कानपुर में 400 साल पुरानी अनोखी परंपरा: बांस-कागज का नहीं, यहां सीमेंट से बने रावण का होता है प्रतीकात्मक वध

उत्तर प्रदेश के कानपुर में विजयादशमी पर बांस और कागज का पुतला जलाने के बजाय सीमेंट से बनी रावण की पक्की प्रतिमा का प्रतीकात्मक वध करने की 400 साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है।

Oct 20, 2026 - 14:01
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कानपुर में 400 साल पुरानी अनोखी परंपरा: बांस-कागज का नहीं, यहां सीमेंट से बने रावण का होता है प्रतीकात्मक वध
  • जहां जलता नहीं रावण का पुतला: कानपुर की ऐतिहासिक रामलीला में दशहरे पर निभाई जाती है अनूठी परंपरा
  • बिना आग लगाए होता है रावण वध: कानपुर में सीमेंट की पक्की प्रतिमा पर तीर चलाकर पूरी होती है लीला
  • दशहरा 2026: चार सदियों से चली आ रही परंपरा, जानिए कानपुर में क्यों नहीं फूंका जाता रावण

देश भर में विजयादशमी के पावन अवसर पर जहां बांस, घास-फूस और पटाखों से भरे रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों को अग्नि के हवाले किया जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसी अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा मौजूद है जो इस सामान्य परिपाटी से बिल्कुल अलग है। यहां पिछले 400 से अधिक वर्षों से रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि सीमेंट और कंक्रीट से निर्मित रावण की स्थायी प्रतिमा का प्रतीकात्मक वध कर धर्म की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

यह अनूठी परंपरा कानपुर की ऐतिहासिक रामलीला से जुड़ी है, जो स्थानीय स्तर पर सदियों से सांस्कृतिक पहचान का केंद्र रही है। यहां मैदान में हर साल नया पुतला बनाने और उसमें आग लगाने की व्यवस्था नहीं है। इसके बजाय मैदान में सीमेंट और ईंट-गारे से तैयार की गई रावण की पक्की प्रतिमा स्थायी रूप से स्थापित है। विजयादशमी के दिन जब प्रभु श्री राम और लंकापति रावण के बीच युद्ध का प्रसंग मंचित होता है, तो भगवान राम का स्वरूप बने कलाकार द्वारा प्रतीकात्मक रूप से बाण चलाया जाता है। बाण लगते ही रावण का वध मान लिया जाता है और पूरी रामलीला मंडली जयघोष के साथ अधर्म पर धर्म की विजय की घोषणा करती है।

इस परंपरा के पीछे स्थानीय मान्यताओं और ऐतिहासिक कारणों का लंबा इतिहास रहा है। आयोजकों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा न केवल पर्यावरण और सुरक्षा के लिहाज से बेहद प्रासंगिक है, बल्कि इसके जरिए यह संदेश दिया जाता है कि रावण जैसे प्रकांड पंडित और ज्ञानी के भौतिक शरीर के बजाय उसकी आसुरी प्रवृत्तियों और अहंकार का अंत करना ही वास्तविक वध है। प्रतिमा को जलाया नहीं जाता, इसलिए यह पूरे साल मैदान में उसी स्वरूप में खड़ी रहती है और हर वर्ष दशहरे पर केवल इसी स्थल पर वध की पारंपरिक रस्म पूरी की जाती है।

कानपुर के अलावा देश के बहुत कम हिस्सों में इस तरह का स्वरूप देखने को मिलता है। आधुनिक दौर में जब प्रदूषण और आतिशबाजी को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, तब कानपुर की चार सदियों पुरानी यह परंपरा सादगी, आस्था और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम बनकर उभरती है। दशहरे के दिन इस ऐतिहासिक क्षण और विशेष मंचन को देखने के लिए शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

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