Special Article: नई राजनीतिक सोच अंधभक्ति, सत्ता का अहंकार, जेनजी आंदोलन और न्यायपालिका की जवाबदेही पर सवाल?

इतिहास साक्षी है कि पाषाणिक, पौराणिक, मध्यकालीन और आधुनिक समाज में सामाजिक शिल्पकारों ने व्यवस्था के निर्माण और

Oct 22, 2026 - 12:07
 0  5
Special Article: नई राजनीतिक सोच अंधभक्ति, सत्ता का अहंकार, जेनजी आंदोलन और न्यायपालिका की जवाबदेही पर सवाल?

विशेष वैचारिक संपादकीय: राजेन्द्र सिंह जादौन


इतिहास साक्षी है कि पाषाणिक, पौराणिक, मध्यकालीन और आधुनिक समाज में सामाजिक शिल्पकारों ने व्यवस्था के निर्माण और विघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चक्रवर्ती सम्राटों से लेकर समाजवादियों तक, सभी ने सत्ता और धन के वितरण को बदलने के दावे किए, लेकिन सामाजिक असमानता का प्रश्न आज भी कायम है। राजतंत्र समाप्त हुआ, लोकतंत्र आया, सरकारें बदलीं, विचारधाराएं बदलीं, लेकिन क्या सत्ता और संपत्ति पर कुछ समूहों का प्रभाव वास्तव में समाप्त हुआ?

आज यही सवाल भारतीय लोकतंत्र के सामने है। क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और बहुमत प्राप्त करने का नाम है, या जनता को सरकार से सवाल पूछने, असहमति जताने और व्यवस्था बदलने का अधिकार भी देता है?

जवाहरलाल नेहरू से इंदिरा गांधी, जयप्रकाश नारायण से अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले राजनीतिक दौर तक, भारतीय राजनीति ने अनेक प्रयोग देखे हैं। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार भी विकास, राष्ट्रवाद और जनकल्याण के दावों के साथ शासन कर रही है। उसके समर्थक उपलब्धियों को रेखांकित करते हैं, जबकि आलोचक बेरोजगारी, महंगाई, संस्थागत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर सवाल उठाते हैं।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना किसी राजनीतिक दल का विरोध भर नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है, जब राजनीतिक निष्ठा विवेक पर हावी हो जाती है और नेता से सवाल पूछने वाले को देशविरोधी या राष्ट्रविरोधी बताने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।

क्या बहुमत प्राप्त करने के बाद सरकार हर सवाल से ऊपर हो जाती है? क्या चुनावी जीत संविधान से बड़े अधिकार दे देती है? बिल्कुल नहीं। बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन संविधान की सीमाओं से मुक्त नहीं करता।

मोदी सरकार के कामकाज की तुलना हिटलर के शासन से करना एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, जिसकी जांच ठोस तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर होनी चाहिए। फिर भी सत्ता के केंद्रीकरण, असहमति के प्रति रवैये और संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। सरकार और उसके समर्थकों को आलोचना का उत्तर तर्क तथा प्रमाणों से देना चाहिए, न कि आलोचक की नीयत पर सवाल उठाकर।

राजनीतिक दल गरीबों, पिछड़ों, युवाओं और वंचितों के नाम पर सत्ता हासिल करते हैं, लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद वास्तविक भागीदारी कितनी सुनिश्चित होती है? समाज का कमजोर वर्ग चुनाव के समय महत्वपूर्ण मतदाता बनता है, मगर क्या नीति निर्माण, बजट निर्धारण और आर्थिक संसाधनों के वितरण में भी उसकी उतनी ही भूमिका होती है?

यही नई राजनीतिक सोच का केंद्रीय प्रश्न है। सामाजिक न्याय केवल भाषणों से नहीं, बल्कि अवसरों की समानता, पारदर्शी प्रशासन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी से स्थापित होता है।

भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल जैसी संस्थाएं आवश्यक हैं, लेकिन केवल दंडात्मक कार्रवाई से व्यवस्था नहीं बदलती। संस्थाओं को स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाना होगा। कानून का शासन मजबूत होना चाहिए, लेकिन उसके नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं को कमजोर नहीं किया जा सकता।

युवाओं का आक्रोश नई राजनीतिक सोच की चर्चा को और महत्वपूर्ण बनाता है। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं, प्रश्नपत्र लीक, बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता जैसे मुद्दे युवाओं के लिए वास्तविक चिंता का विषय हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से उभरने वाले नए राजनीतिक समूह और व्यंग्यात्मक नामों वाले आंदोलन भी इसी असंतोष की अभिव्यक्ति हो सकते हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नाम से चर्चित आंदोलन को भी इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। हालांकि इसके गठन, नेतृत्व, मांगों और राजनीतिक प्रभाव से जुड़े प्रत्येक दावे की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। किसी आंदोलन की लोकप्रियता अपने आप में उसकी मांगों की सत्यता का प्रमाण नहीं होती, लेकिन उसे केवल मजाक या राजनीतिक विरोध कहकर खारिज करना भी उचित नहीं है।

युवाओं का प्रश्न सीधा है यदि वे वर्षों तक परीक्षाओं की तैयारी करें, परिवार अपनी कमाई शिक्षा पर खर्च करे और फिर परीक्षा में अनियमितताओं या प्रश्नपत्र लीक के कारण भविष्य प्रभावित हो, तो जवाबदेही किसकी होगी? क्या सरकार केवल नई योजनाओं की घोषणा करेगी, या परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई भी सुनिश्चित करेगी?

यही वह बिंदु है जहां आंदोलन को नारेबाजी से आगे बढ़कर ठोस कार्यक्रम देना होगा। सरकार को शिकायतों का समाधान करना होगा और आंदोलनों को भी शांतिपूर्ण, संवैधानिक तथा जवाबदेह तरीके से अपनी मांगें रखनी होंगी।

लोकतंत्र में न्यायपालिका नागरिक अधिकारों की रक्षा और सरकार की शक्तियों पर संवैधानिक नियंत्रण का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसके फैसलों, टिप्पणियों या कार्यप्रणाली पर तर्कपूर्ण चर्चा नहीं हो सकती।

यदि किसी न्यायिक टिप्पणी से युवाओं या बेरोजगारों के अपमान का अनुभव पैदा होता है, तो उसके संदर्भ और प्रभाव पर बहस हो सकती है। साथ ही, किसी एक टिप्पणी के आधार पर पूरी न्यायपालिका के बारे में निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा।

अदालतों में मामलों का लंबित रहना, न्याय मिलने में देरी, जमानत और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। न्याय का उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं, बल्कि नागरिक को समय पर निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराना भी है।

सरकार हो, प्रशासन हो या न्यायपालिका सभी संस्थाओं की जवाबदेही संविधान के दायरे में होनी चाहिए। स्वतंत्रता और जवाबदेही एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की पूरक हैं।

किसी नए राजनीतिक दल या जन आंदोलन की वास्तविक परीक्षा सड़क पर जुटी भीड़ से नहीं, बल्कि उसके संगठन और कार्यप्रणाली से होती है। यदि कोई दल सत्ता और धन के असमान वितरण को बदलना चाहता है, तो उसे पंचायत और नगरीय निकायों से शुरुआत करके अपनी स्वीकार्यता तथा प्रशासनिक क्षमता का परीक्षण करना चाहिए।

स्थानीय स्तर पर पारदर्शी बजट, सार्वजनिक खर्च का सामाजिक अंकेक्षण, रोजगार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी जैसे काम करके जनता का विश्वास अर्जित किया जा सकता है। इसके बाद विधानसभा और लोकसभा की राजनीति में प्रभावी विकल्प प्रस्तुत करना अधिक सार्थक होगा।

सामाजिक परिवर्तन केवल सरकार बदलने से नहीं आएगा। परिवार, विद्यालय, व्यापारिक संगठन, उद्योग, प्रशासन और नागरिक समाज को भी समानता तथा जवाबदेही की संस्कृति विकसित करनी होगी। हिंसक क्रांति इसका अनिवार्य रास्ता नहीं है। संवैधानिक और शांतिपूर्ण संघर्ष भी व्यापक बदलाव का माध्यम बन सकता है।

आज आवश्यकता ऐसी नई राजनीतिक सोच की है, जो अंधभक्ति के स्थान पर विवेक, सत्ता के अहंकार के स्थान पर जवाबदेही और प्रतीकात्मक आंदोलनों के स्थान पर ठोस कार्यक्रम स्थापित करे।

मोदी सरकार हो या कोई अन्य सरकार, न्यायपालिका हो या राजनीतिक आंदोलन किसी को भी प्रमाण, तर्क और संवैधानिक समीक्षा से ऊपर नहीं माना जाना चाहिए। बहुमत का सम्मान जरूरी है, लेकिन अल्पमत के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि सत्ता में कौन बैठा है, बल्कि यह है कि सत्ता से सवाल पूछने वाले नागरिक के अधिकार कितने सुरक्षित हैं।

जिस दिन जनता नेता को संविधान से बड़ा मानने लगेगी और राजनीतिक निष्ठा विवेक का स्थान ले लेगी, उस दिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। नई राजनीति का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति या दल को हटाना भर नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें सत्ता और धन का केंद्रीकरण कम हो, संस्थाएं स्वतंत्र रहें और समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज निर्णय प्रक्रिया तक पहुंचे।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार जनता के लिए होती है, जनता सरकार के लिए नहीं। सत्ता बदल सकती है, आंदोलन उठ सकते हैं और विचारधाराएं बदल सकती हैं, लेकिन संविधान, नागरिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के सिद्धांत ही लोकतंत्र को जीवित रखते हैं।

Also Read- Special Article: पिता चले जाते हैं, संस्कारों की रोशनी रह जाती है

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow