Bollywood: काजोल ने 11 साल की उम्र में क्यों बनाया स्कूल से भागने का प्लान? बस में इंतजार के दौरान पकड़ी गईं।
Entertainment News: बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री काजोल आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। अपनी शानदार एक्टिंग और बेबाक अंदाज के लिए जानी ...
Entertainment News: बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री काजोल आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। अपनी शानदार एक्टिंग और बेबाक अंदाज के लिए जानी जाने वाली काजोल ने हाल ही में अपने बचपन की एक दिलचस्प और भावुक कहानी साझा की है। यह कहानी उस समय की है जब वह महज 11 साल की थीं और उन्होंने अपने बोर्डिंग स्कूल से भागने का प्लान बनाया था। लेकिन उनका यह प्लान पूरा नहीं हो सका, क्योंकि बस स्टैंड पर इंतजार करते समय वह पकड़ी गईं।
- काजोल का बचपन और बोर्डिंग स्कूल
काजोल का जन्म 5 अगस्त 1974 को मुंबई में हुआ था। उनकी मां तनुजा एक मशहूर अभिनेत्री थीं, जबकि उनके पिता शोमू मुखर्जी एक फिल्म निर्माता और निर्देशक थे। काजोल का परिवार फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक रखता था, जिसमें उनकी मौसी नूतन, नानी शोभना समर्थ, और दादा सशाधर मुखर्जी जैसे बड़े नाम शामिल थे। काजोल का बचपन चार पीढ़ियों की महिलाओं—उनकी परनानी, नानी, मां, और खुद काजोल—के बीच बीता। इस माहौल ने उन्हें एक मजबूत और स्वतंत्र व्यक्तित्व दिया। काजोल को उनकी पढ़ाई के लिए पंचगनी के सेंट जोसेफ्स कॉन्वेंट स्कूल में भेजा गया था, जो मुंबई से लगभग पांच घंटे की दूरी पर है। यह बोर्डिंग स्कूल उनके लिए एक नया अनुभव था, जहां उन्होंने न केवल पढ़ाई की, बल्कि कई जीवन सबक भी सीखे। काजोल ने बताया कि बोर्डिंग स्कूल ने उन्हें आत्मनिर्भरता, अनुशासन, और समाज में घुलने-मिलने की कला सिखाई। लेकिन 11 साल की उम्र में उनके मन में एक ऐसी भावना जागी, जिसने उन्हें स्कूल से भागने का प्लान बनाने के लिए प्रेरित किया।
- भागने का कारण: परनानी की बीमारी
काजोल ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि जब वह 11 साल की थीं, तब उन्हें पता चला कि उनकी परनानी (मां की नानी) गंभीर रूप से बीमार हैं। काजोल अपनी परनानी से बहुत करीब थीं और उनके बीमार होने की खबर ने उन्हें बहुत बेचैन कर दिया। उन्होंने अपनी मां तनुजा से फोन पर बात की और घर आने की इजाजत मांगी। लेकिन तनुजा ने उन्हें मना कर दिया, क्योंकि काजोल के स्कूल में परीक्षाएं चल रही थीं। तनुजा ने कहा कि वह दिसंबर में छुट्टियों के दौरान ही घर आ सकती हैं लेकिन 11 साल की काजोल का दिल अपनी परनानी के लिए बेचैन था। वह उनकी हालत के बारे में सोचकर परेशान थीं और किसी भी कीमत पर उनसे मिलना चाहती थीं। इस भावना ने उन्हें इतना मजबूर कर दिया कि उन्होंने स्कूल से भागने का फैसला कर लिया। काजोल ने बताया, "मुझे पता चला कि मेरी परनानी बहुत बीमार हैं। मैंने मम्मी को फोन किया, लेकिन उन्होंने मुझे आने की इजाजत नहीं दी, क्योंकि मेरी परीक्षाएं थीं। उन्होंने कहा कि दिसंबर की छुट्टियों में आना। लेकिन मैं 11 साल की थी, और मुझे उनसे मिलना था।"
- भागने का प्लान
काजोल ने अपने इस प्लान को अंजाम देने के लिए एक दोस्त को साथ लिया। उन्होंने अपने स्थानीय गार्जियन (मामा) से झूठ बोला कि उनकी मां ने उन्हें घर बुलाया है। काजोल ने अपने मामा से कहा, "मम्मी ने मुझे घर बुलाया है, मुझे बस स्टैंड तक छोड़ दो।" मामा ने उनकी बात मान ली और उन्हें पंचगनी के बस स्टैंड तक छोड़ दिया। काजोल बस में बैठ गईं और मुंबई के लिए निकलने की तैयारी करने लगीं। लेकिन उनका यह प्लान ज्यादा दूर तक नहीं चल सका। बस स्टैंड पर इंतजार करते समय स्कूल की नन (सिस्टर) वहां पहुंच गईं। काजोल ने हंसते हुए बताया, "मैं बस में इंतजार कर रही थी, तभी नन आईं और उन्होंने मुझे कान पकड़कर वापस स्कूल ले गईं।" इस तरह, काजोल का भागने का प्लान नाकाम रहा, और उन्हें स्कूल वापस लौटना पड़ा।
- बोर्डिंग स्कूल का अनुभव और सीख
हालांकि काजोल का यह प्लान सफल नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उन्होंने बताया कि बोर्डिंग स्कूल ने उन्हें जिंदगी के कई अहम सबक सिखाए। काजोल का मानना है कि बोर्डिंग स्कूल बच्चों को माता-पिता की अहमियत समझाता है और उन्हें समाज में ढलने की कला सिखाता है। उन्होंने कहा, "वहां बच्चे अपने माता-पिता की वैल्यू समझते हैं। यह आपको समाज में बेहतर ढंग से एडजस्ट करना सिखाता है।" काजोल को अपने बोर्डिंग स्कूल के दिनों की बहुत सारी अच्छी यादें हैं। उन्होंने बताया कि वहां का अनुशासन और स्वतंत्रता का माहौल उनके लिए बहुत खास था। इतना ही नहीं, काजोल बोर्डिंग स्कूल की इतनी बड़ी समर्थक हैं कि उन्होंने अपनी बेटी न्यासा को भी बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा। साथ ही, वह अपने 14 साल के बेटे युग को भी भविष्य में बोर्डिंग स्कूल भेजने की योजना बना रही हैं। काजोल की यह कहानी न केवल उनके बचपन की मासूमियत को दर्शाती है, बल्कि उनकी भावनात्मक गहराई को भी दिखाती है। 11 साल की उम्र में अपनी परनानी के लिए इतना गहरा लगाव और उन्हें देखने की चाहत बताती है कि काजोल हमेशा से दिल से सोचने वाली इंसान रही हैं। यह घटना उनके बेबाक और जिद्दी स्वभाव को भी दर्शाती है, जिसके बारे में वह खुद भी कहती हैं कि वह बचपन में काफी शरारती और जिद्दी थीं।
काजोल ने बताया कि उनकी मां तनुजा ने उन्हें हमेशा स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का महत्व सिखाया। उनके माता-पिता का तलाक तब हुआ था, जब काजोल छोटी थीं, लेकिन उनकी मां ने कभी इस बात को घर में चर्चा का विषय नहीं बनने दिया। काजोल की परवरिश में उनकी नानी ने भी अहम भूमिका निभाई, जिसने उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि उनकी मां काम के सिलसिले में बाहर रहती थीं।
- काजोल का करियर और आज का समय
काजोल ने अपने करियर की शुरुआत 1992 में फिल्म 'बेखुदी' से की थी, जब वह स्कूल में थीं। इसके बाद 'बाज़ीगर' (1993), 'ये दिल्लगी' (1994), 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995), और 'कुछ कुछ होता है' (1998) जैसी फिल्मों ने उन्हें बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया। उन्होंने छह फिल्मफेयर अवॉर्ड्स जीते, जिनमें से पांच बेस्ट एक्ट्रेस के लिए हैं। 2011 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म से सम्मानित किया।
आज काजोल न केवल एक अभिनेत्री हैं, बल्कि एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। वह विधवाओं और बच्चों के लिए काम करती हैं और अपने पति अजय देवगन के साथ देवगन एंटरटेनमेंट एंड सॉफ्टवेयर लिमिटेड में मैनेजरियल भूमिका निभाती हैं। उनकी हालिया फिल्म 'दो पत्ती' (2024) को दर्शकों ने खूब पसंद किया।
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