ट्रंप की मध्यस्थता विवाद: पाकिस्तान ने श्रेय दिया, भारत ने खारिज किया; रघुराम राजन ने अमेरिकी टैरिफ को व्यक्तिगत टकराव का परिणाम बताया। 

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था, जब एक आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन

Dec 10, 2025 - 11:17
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ट्रंप की मध्यस्थता विवाद: पाकिस्तान ने श्रेय दिया, भारत ने खारिज किया; रघुराम राजन ने अमेरिकी टैरिफ को व्यक्तिगत टकराव का परिणाम बताया। 
ट्रंप की मध्यस्थता विवाद: पाकिस्तान ने श्रेय दिया, भारत ने खारिज किया; रघुराम राजन ने अमेरिकी टैरिफ को व्यक्तिगत टकराव का परिणाम बताया। 

मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था, जब एक आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित नौ आतंकी ठिकानों पर हमले किए गए। इस घटना ने दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच चार दिनों तक चली झड़पों को जन्म दिया, जिसमें सीमा पर गोलीबारी, ड्रोन हमले और मिसाइल स्ट्राइक्स शामिल थे। इस संघर्ष ने क्षेत्रीय शांति को गंभीर खतरे में डाल दिया, और वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी। अंततः 10 मई को एक युद्धविराम की घोषणा हुई, जिसने तत्काल राहत प्रदान की, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि और श्रेय को लेकर विवाद आज भी थम नहीं सका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्धविराम को अपनी मध्यस्थता का परिणाम बताया, जबकि भारत ने इसे पूरी तरह द्विपक्षीय समझौता करार दिया।

इस अंतर ने न केवल कूटनीतिक स्तर पर तनाव पैदा किया, बल्कि व्यापारिक संबंधों को भी प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप भारत पर 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लगाए गए। पूर्व रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया गवर्नर रघुराम राजन ने हाल ही में इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ये टैरिफ रूसी तेल खरीद से कम और व्हाइट हाउस में व्यक्तिगत टकराव से ज्यादा जुड़े हुए हैं। संघर्ष की शुरुआत अप्रैल 2025 के अंत में हुई, जब भारतीय प्रशासित कश्मीर के पहलगाम में 26 पर्यटकों पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले ने भारत को निर्णायक कार्रवाई के लिए मजबूर किया, और 5 मई को ऑपरेशन सिंदूर के नाम से पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में सटीक हमले किए गए। पाकिस्तान ने इसका जवाब ड्रोन और सीमा पार गोलीबारी से दिया, जिससे लाइन ऑफ कंट्रोल पर तनाव बढ़ गया। चार दिनों के दौरान दोनों पक्षों से 70 से अधिक लोग मारे गए, ज्यादातर कश्मीर क्षेत्र में। वैश्विक समुदाय ने तत्काल शांति की अपील की, और संयुक्त राष्ट्र सहित कई संगठनों ने दोनों देशों से संयम बरतने का आग्रह किया। इस बीच, अमेरिका ने पीछे से सक्रिय भूमिका निभाई, जहां विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख से संपर्क साधा और डी-एस्केलेशन के लिए दबाव बनाया। 10 मई को सुबह-सुबह ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर घोषणा की कि अमेरिकी मध्यस्थता के बाद भारत और पाकिस्तान ने पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमति जताई है। उन्होंने इसे अपनी कूटनीतिक सफलता बताया, जो यूक्रेन जैसे अन्य संघर्षों में उनकी ब्रोकरिंग शैली का उदाहरण था।

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया तुरंत सकारात्मक रही। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद दिया और उनकी नेतृत्व भूमिका की सराहना की। उन्होंने इसे दक्षिण एशिया में शांति के लिए अमेरिका के योगदान के रूप में देखा, और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तथा विदेश मंत्री रुबियो को भी श्रेय दिया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि वे युद्धविराम के वफादार पालन के लिए प्रतिबद्ध हैं, और इसने क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा दिया। शरीफ ने यहां तक कहा कि ट्रंप एक शांति पुरुष हैं, और उनकी इस भूमिका के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन का समर्थन किया। पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत के समकक्ष से सीधी बातचीत के बाद युद्धविराम की पुष्टि की, लेकिन अमेरिकी भूमिका को स्वीकार किया। इसने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक जिम्मेदार पक्ष के रूप में पेश किया, और संघर्ष को दोनों पक्षों के लिए जीत के रूप में चित्रित करने में मदद की। पाकिस्तान ने जोर दिया कि वे भारत के हमलों का जवाब दे सकते थे, लेकिन शांति के हित में रुके। इसके विपरीत, भारत ने ट्रंप के दावे को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि युद्धविराम पूरी तरह द्विपक्षीय था, और दोनों देशों के डीजीएमओ के बीच सीधी सैन्य चैनलों से तय हुआ। उन्होंने जोर दिया कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े किसी भी मुद्दे पर तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं हो सकती, जो भारत की लंबे समय से चली आ रही नीति है। भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तानी डीजीएमओ ने दो बार संपर्क किया था, और युद्धविराम के बाद रावलपिंडी ने दिल्ली से विराम मांगा था। भारत ने इसे अपनी सैन्य क्षमता का प्रमाण बताया, जहां उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाया बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के। इस स्टैंड ने भारत को स्वतंत्र और मजबूत राष्ट्र के रूप में पेश किया, लेकिन ट्रंप के सार्वजनिक दावों से टकराव पैदा कर दिया। ट्रंप ने बाद में कहा कि व्यापारिक रियायतों के जरिए उन्होंने दोनों देशों को रोका, लेकिन भारत ने इसे अस्वीकार किया।

युद्धविराम की घोषणा के तुरंत बाद उल्लंघनों की रिपोर्ट्स आईं। कश्मीर में विस्फोटों और सीमा पार हमलों के आरोप लगे, लेकिन कुल मिलाकर यह पकड़ में रहा। वैश्विक नेता जैसे नए पोप लियो ने इसे शांति की दिशा में कदम बताया, और बातचीत से स्थायी समाधान की उम्मीद जताई। अमेरिकी दस्तावेजों में ट्रंप को भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने का श्रेय दिया गया, जहां इसे संभावित परमाणु युद्ध से बचाव के रूप में वर्णित किया। राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज में 33 पृष्ठों में ट्रंप की शांति ब्रोकरिंग को सूचीबद्ध किया, जिसमें कंबोडिया, कोसोवो और अन्य शामिल थे। हालांकि, भारत ने इन दावों को बार-बार खारिज किया, और संसदीय समिति को बताया कि संघर्ष पारंपरिक स्तर पर रहा, बिना किसी परमाणु संकेत के। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पष्ट किया कि युद्धविराम अमेरिकी मध्यस्थता से नहीं, बल्कि द्विपक्षीय निर्णय से हुआ। इस विवाद ने व्यापारिक मोर्चे पर असर डाला। अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए, जिसमें 25 प्रतिशत बेस टैरिफ और 25 प्रतिशत रूसी तेल खरीद पर दंडात्मक था। इससे भारतीय निर्यात प्रभावित हुए, खासकर श्रिंप फार्मर्स, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग जैसे छोटे निर्यातकों को। पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने 4 दिसंबर को ज्यूरिख विश्वविद्यालय के यूबीएस सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स इन सोसाइटी में बोलते हुए कहा कि ये टैरिफ रूसी तेल से कम, बल्कि व्हाइट हाउस में व्यक्तित्वों के टकराव से ज्यादा जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने मई संघर्ष रोकने का श्रेय लिया, पाकिस्तान ने इसे स्वीकार किया, जबकि भारत ने कहा कि यह बिना अमेरिकी हस्तक्षेप के द्विपक्षीय था। राजन ने कहा कि सच्चाई शायद बीच में है, लेकिन नतीजा यह हुआ कि भारत को 50 प्रतिशत टैरिफ मिला, पाकिस्तान को 19 प्रतिशत। उन्होंने जोर दिया कि मुख्य मुद्दा व्हाइट हाउस की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया थी, खासकर ट्रंप के सार्वजनिक दावे के बाद भारत के जवाब से।

राजन ने आगे कहा कि व्यापार, निवेश और वित्त को हथियार बनाया जा रहा है, और भारत को किसी एक व्यापारिक साझेदार पर निर्भरता कम करनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पूर्व की ओर एशियन देशों, यूरोप और अफ्रीका की ओर देखें, और आंतरिक सुधारों से 8-8.5 प्रतिशत विकास हासिल करें। उन्होंने टैरिफ को भारत के लिए जागृति का संकेत बताया, जहां रिफाइनर्स को रूसी तेल से लाभ हो रहा है, लेकिन निर्यातक नुकसान उठा रहे हैं। यदि लाभ कम है, तो खरीद पर पुनर्विचार जरूरी। राजन ने कहा कि अमेरिका के साथ संबंध टूट चुके हैं, क्योंकि भारत पर एशिया में सबसे ऊंचा टैरिफ है। उन्होंने ट्रंप की नीति को शक्ति प्रदर्शन बताया, न कि निष्पक्षता। अप्रैल में ट्रंप के 60 देशों पर 10-50 प्रतिशत टैरिफ को उन्होंने स्व-लक्ष्य कहा, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पहले नुकसान पहुंचाएगा। भारत पर प्रभाव अपेक्षाकृत कम होगा, क्योंकि अन्य देश भी प्रभावित हैं। संघर्ष के बाद ट्रंप ने कई बार श्रेय लिया, जैसे साउथ अफ्रीकी राष्ट्रपति से मिलते हुए कहा कि व्यापारिक बातों से तनाव कम हुआ। लेकिन भारत ने इसे खारिज किया, और कहा कि कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय है। दिसंबर में नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में फिर ट्रंप को श्रेय दिया गया, जो भारत ने अस्वीकार किया। रुबियो ने कहा कि ट्रंप को खतरनाक सौदों के लिए श्रेय मिलना चाहिए। इसने भारत-अमेरिका संबंधों में ठंडक ला दी। राजन ने कहा कि उम्मीद है लंबे समय में समझदारी लौतेगी, और दोनों पक्ष उचित सौदे करेंगे। युद्धविराम ने कश्मीर विवाद के मूल मुद्दों को हल नहीं किया, लेकिन तत्काल युद्ध टल गया। दोनों देशों ने इसे अपनी जीत बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भिन्न कथानक बने। पाकिस्तान ने अमेरिकी साझेदारी मजबूत की, जबकि भारत ने स्वायत्तता पर जोर दिया।

टैरिफ के प्रभाव व्यापक हैं। भारतीय निर्यात में गिरावट आई, खासकर श्रम-गहन क्षेत्रों में। राजन ने कहा कि चीन की तुलना में भारत का मुद्दा भू-राजनीतिक है, न कि निष्पक्षता। उन्होंने सुझाव दिया कि घरेलू टैरिफ कम करें, जो भारत को लाभ देगा। वैश्विक संरक्षणवाद बढ़ रहा है, इसलिए व्यापार में चतुराई जरूरी। पूर्व की ओर एएसईएएन, जापान; दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका; उत्तर-पश्चिम यूरोप की ओर देखें। साउथ एशियन क्षेत्रीय सहयोग संगठन में मजबूत पुल बनाएं। राजन ने कहा कि अमेरिका पर भरोसा न करें, जैसा 1971 युद्ध में निक्सन ने पाकिस्तान का साथ दिया। वर्तमान में, एच-1बी वीजा शुल्क बढ़ोतरी से ज्यादा, एचआईआरई एक्ट का खतरा है, जो आउटसोर्सिंग सेवाओं पर टैरिफ लगाएगा। इससे भारतीय आईटी और बैक-ऑफिस को नुकसान। डिजिटलीकरण से वीजा मांग कम हो सकती है, लेकिन डिजिटल सेवाओं पर टैक्स बड़ा जोखिम।

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