'वतन से प्यार करते रहेंगे लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की', वंदे मातरम सर्कुलर पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जताई गहरी चिंता।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्र सरकार द्वारा 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य आयोजनों
- वंदे मातरम अनिवार्य करने के सर्कुलर पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का विरोध: संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन, धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला
- केंद्र के वंदे मातरम निर्देश पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद की आपत्ति: सभी छंद गाना मुसलमानों के लिए अस्वीकार्य, इबादत केवल अल्लाह की
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने केंद्र सरकार द्वारा 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य आयोजनों में अनिवार्य करने के सर्कुलर पर गहरी चिंता जताई है। संगठन ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है। महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि वतन से प्यार करते रहेंगे, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की होगी। अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला करार दिया। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी 2026 को एक अधिसूचना जारी की जिसमें 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को राष्ट्रीय गान और राष्ट्रगान के साथ बजाए जाने पर अनिवार्य किया गया। सरकारी कार्यक्रमों, राष्ट्रपति के आगमन, तिरंगा फहराने, राज्यपालों के भाषणों और स्कूल-कॉलेजों में इसे पहले गाना निर्देशित किया गया। अधिसूचना में गीत को राष्ट्रीय गान के समान सम्मान देने और खड़े होकर सुनने का प्रावधान है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने सर्कुलर को अत्यंत चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि मुसलमान वतन से प्यार करते रहेंगे लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की होगी। संगठन ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के विरुद्ध बताया जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
- अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का बयान
जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि केंद्र सरकार का यह एकतरफा और जबरन थोपा गया फैसला है। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने का प्रयास बताया। मदनी ने कहा कि मुसलमान किसी को 'वंदे मातरम' गाने या बजाने से नहीं रोकते लेकिन गीत की कुछ पंक्तियां बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो एकेश्वरवादी इस्लामी आस्था से टकराती हैं।
- धार्मिक आधार पर आपत्ति
मदनी ने कहा कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और किसी अन्य को ईश्वर के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। गीत के कुछ छंदों में पूजा के शब्दों का इस्तेमाल है और इसका अनुवाद 'मां मैं तेरी पूजा करता हूं' जैसा है जो इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने इसे शिर्क (खुदा के साथ किसी को शामिल करना) से संबंधित बताया।
- संवैधानिक उल्लंघन का दावा
जमीयत ने कहा कि मुसलमानों को गीत गाने पर विवश करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लंघन है। संगठन ने इसे चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की चाल बताया। मदनी ने कहा कि देशप्रेम नारे नहीं बल्कि चरित्र और बलिदान से साबित होता है।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रतिक्रिया
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी सर्कुलर को असंवैधानिक बताया और इसे वापस लेने की मांग की। बोर्ड ने कहा कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और सेक्युलर मूल्यों के खिलाफ है तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के विरुद्ध है। बोर्ड ने इसे अदालत में चुनौती देने की बात कही। यह सर्कुलर जारी होने के बाद मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने विरोध जताया है। जमीयत ने कहा कि मातृभूमि से मोहब्बत दिल में होती है और प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं। संगठन ने देश की विविधता और धार्मिक संरचना के अनुकूल न होने की बात कही। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सर्कुलर को वापस लेने की मांग की है। संगठन ने कहा कि ऐसा फैसला देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावित करेगा। जांच और आगे की कार्रवाई जारी है।
What's Your Reaction?







