निठारी कांड: सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर की बरी फैसले को बरकरार रखा।

Noida Nithari Murder: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के चर्चित निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो....

Jul 31, 2025 - 13:04
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निठारी कांड: सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर की बरी फैसले को बरकरार रखा।
निठारी कांड: सुप्रीम कोर्ट ने सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर की बरी फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के चर्चित निठारी हत्याकांड में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), उत्तर प्रदेश सरकार और पीड़ितों के परिवारों द्वारा दायर 14 याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के 16 अक्टूबर 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने कोली और पंढेर को 12 और 2 मामलों में बरी कर दिया था, जिसमें उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि जांच में गंभीर खामियां थीं और सबूतों में विश्वसनीयता की कमी थी। हालांकि, कोली एक अन्य मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं, इसलिए वे जेल में रहेंगे, जबकि पंढेर सभी मामलों में बरी हो चुके हैं।

निठारी कांड 2006 में उस समय सुर्खियों में आया, जब 29 दिसंबर 2006 को नोएडा के निठारी गांव में मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे एक नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिले। बाद में, आसपास के नालों और जमीन की खुदाई में और कंकाल बरामद हुए, जिनमें ज्यादातर गरीब परिवारों की बच्चियों और युवतियों के अवशेष थे। इस मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, क्योंकि इसमें बलात्कार, हत्या और कथित नरभक्षण जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।

मोनिंदर सिंह पंढेर, जो एक व्यवसायी थे, इस घर के मालिक थे, और सुरेंद्र कोली उनके घरेलू नौकर के रूप में काम करते थे। सीबीआई ने जनवरी 2007 में इस मामले की जांच अपने हाथ में ली और 19 मामले दर्ज किए। इनमें कोली पर सभी 19 मामलों में हत्या, अपहरण, बलात्कार और सबूत नष्ट करने के आरोप लगाए गए, जबकि पंढेर पर शुरू में एक मामले में अनैतिक व्यापार और बाद में पांच अन्य मामलों में आरोप लगाए गए।

  • जांच और मुकदमे की शुरुआत

सीबीआई ने दावा किया कि कोली ने कई बच्चियों को बहला-फुसलाकर पंढेर के घर लाया, जहां उनके साथ बलात्कार और हत्या की गई। इसके बाद, शवों को काटकर नाले में फेंक दिया गया। जांच के दौरान नाले से 19 पीड़ितों के कंकाल, कपड़े और अन्य सामान बरामद किए गए। गाजियाबाद की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 2009 से 2017 तक कई मामलों में कोली को 12 और पंढेर को 2 मामलों में मौत की सजा सुनाई। कोली को 14 वर्षीय रिम्पा हलधर की हत्या के लिए 13 फरवरी 2009 को मौत की सजा दी गई, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 सितंबर 2009 को और सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी 2011 को बरकरार रखा।

हालांकि, कोली की दया याचिका में देरी के कारण जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। इस देरी में 7 मई 2011 से 19 जुलाई 2013 तक 26 महीने का समय शामिल था, जिसे कोर्ट ने अनुचित माना। पंढेर को तीन मामलों में निचली अदालत और बाकी में हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोली को 12 और पंढेर को 2 मामलों में बरी कर दिया। कोर्ट ने जांच को “लापरवाह और अविश्वसनीय” बताया और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का दोष “निस्संदेह” साबित करने में विफल रहा। हाईकोर्ट ने कई खामियों पर ध्यान दिया:

कोली का इकबालिया बयान 60 दिनों की पुलिस हिरासत के बाद लिया गया, जिसमें यातना के आरोप थे। यह बयान आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 का पालन किए बिना दर्ज किया गया।

सबूतों की बरामदगी भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत वैध नहीं थी, क्योंकि यह कोली के बयान के आधार पर नहीं, बल्कि खुले नाले से की गई थी।

जांच में बुनियादी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, जैसे कि मेडिकल जांच और कानूनी सहायता प्रदान करना।

अभियोजन पक्ष के पास इकबालिया बयान के अलावा कोई ठोस सबूत नहीं था, और यह बयान संदिग्ध परिस्थितियों में लिया गया था।

हाईकोर्ट ने जांच को “जांच एजेंसियों द्वारा जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात” करार दिया और दोनों आरोपियों को बरी कर दिया।

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला

30 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने 14 याचिकाओं को खारिज कर दिया। इनमें 12 याचिकाएं सीबीआई और दो याचिकाएं पीड़ितों के परिवारों, पप्पू लाल और अनिल हलधर ने दायर की थीं। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई “विकृति” नहीं है और अभियोजन पक्ष वैध सबूत पेश करने में विफल रहा।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “हमें एक भी ऐसा फैसला दिखाएं, जिसमें बिना आरोपी के बयान के पुलिस द्वारा की गई बरामदगी को सबूत के रूप में स्वीकार किया गया हो।” कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 का हवाला देते हुए कहा कि नाले से मिले कंकाल और सामान कोली के बयान के आधार पर बरामद नहीं किए गए थे, इसलिए वे सबूत के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि निचली अदालत का फैसला “मीडिया ट्रायल” पर आधारित हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया, जिसमें जांच की खामियों को रेखांकित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोष साबित करने के मानकों को पूरा नहीं किया।

इस फैसले के बाद मोनिंदर सिंह पंढेर सभी छह मामलों में पूरी तरह बरी हो चुके हैं और अब जेल से बाहर हैं। दूसरी ओर, सुरेंद्र कोली रिम्पा हलधर हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं, इसलिए वे जेल में रहेंगे। सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा, “कोली एक मामले में आजीवन कारावास के कारण जेल में रहेंगे।”

निठारी कांड में पीड़ितों के परिवारों को इस फैसले से गहरा झटका लगा है। पप्पू लाल, जिनकी बेटी इस कांड की शिकार थी, ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी सहित कई गरीब परिवारों के बच्चों को क्रूरता से मारा गया, लेकिन जांच की खामियों ने न्याय को मुश्किल बना दिया। परिवारों का मानना है कि जांच में लापरवाही के कारण असली दोषियों को सजा नहीं मिली।

  • जांच की खामियां और सबक

इस मामले ने भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े किए। इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने जांच में कई खामियों को बताया, जैसे:

इकबालिया बयान को संदिग्ध परिस्थितियों में लेना और यातना के आरोपों की अनदेखी।

सबूतों की बरामदगी में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न करना।

निचली अदालत में मीडिया के दबाव में जल्दबाजी में फैसले लेना।

यह मामला जांच एजेंसियों के लिए एक सबक है कि सबूतों को वैज्ञानिक और कानूनी तरीके से इकट्ठा करना जरूरी है। साथ ही, यह समाज के लिए भी चेतावनी है कि मीडिया ट्रायल से बचना चाहिए, क्योंकि यह निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित कर सकता है।

निठारी कांड भारत के इतिहास में एक भयावह और जटिल मामला है, जिसने जांच और न्याय प्रणाली की खामियों को सामने लाया। सुप्रीम कोर्ट का 30 जुलाई 2025 का फैसला, जिसमें सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर की बरी को बरकरार रखा गया, यह दर्शाता है कि कानून में सबूतों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया का पालन सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि, पीड़ितों के परिवारों को इस फैसले से निराशा हुई है। यह मामला भविष्य में जांच एजेंसियों और अदालतों के लिए एक उदाहरण होगा कि निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच ही सच्चे न्याय की गारंटी हो सकती है।

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