भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस सूर्यकांत, 15 महीने के कार्यकाल में न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने का संकल्प।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में रविवार को एक ऐतिहासिक क्षण आया जब जस्टिस सूर्यकांत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष शपथ ग्रहण की और देश
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में रविवार को एक ऐतिहासिक क्षण आया जब जस्टिस सूर्यकांत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष शपथ ग्रहण की और देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार संभाला। यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत की गई है, जहां राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर अगले वरिष्ठतम न्यायाधीश को पद पर नियुक्त करने का अधिकार है। जस्टिस सूर्यकांत ने जस्टिस बी.आर. गवई का स्थान लिया, जिनका सेवानिवृत्ति का दिन 23 नवंबर 2025 था। जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल 9 फरवरी 2027 तक चलेगा, जब वे 65 वर्ष के हो जाएंगे। शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन में आयोजित हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला, विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। विदेशी न्यायिक प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हुए, जैसे भूटान, केन्या, मलेशिया, मॉरीशस, नेपाल और श्रीलंका के मुख्य न्यायाधीश। जस्टिस सूर्यकांत ने शपथ के बाद कहा कि उनका पहला लक्ष्य सर्वोच्च न्यायालय में लंबित 90,000 मामलों को कम करना होगा, ताकि न्याय जल्द और सुलभ हो सके।
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म 10 फरवरी 1962 को हरियाणा के हिसार जिले में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनका बचपन गांव के आसपास बीता, जहां मेहनत और शिक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूलों से प्राप्त की। कानून की डिग्री के लिए उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से एलएलबी किया और बाद में उसी विश्वविद्यालय से कानून में मास्टर्स पूरा किया, जहां वे फर्स्ट क्लास फर्स्ट रहे। 1985 में उन्होंने हिसार जिला न्यायालय में वकालत शुरू की। जल्द ही वे चंडीगढ़ चले गए और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने लगे। उनकी वकालत का क्षेत्र मुख्य रूप से संवैधानिक, आपराधिक और नागरिक मामलों पर केंद्रित था। जस्टिस सूर्यकांत ने कई महत्वपूर्ण केस लड़े, जहां उन्होंने कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा की।
उनकी कानूनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब 7 जुलाई 2000 को वे हरियाणा के सबसे युवा महाधिवक्ता नियुक्त हुए। उस समय उनकी उम्र मात्र 38 वर्ष थी। मार्च 2001 में उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिला। महाधिवक्ता के रूप में उन्होंने राज्य सरकार के कई बड़े मुकदमों में पैरवी की, जिसमें भूमि सुधार और पर्यावरण संबंधी मामले शामिल थे। 9 जनवरी 2004 को उन्हें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया। यहां उन्होंने कई उल्लेखनीय फैसले सुनाए। उदाहरण के लिए, जसवीर सिंह मामले में उन्होंने जेल सुधारों पर जोर दिया। उन्होंने पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि कैदियों के लिए कन्वेजल विजिट और फैमिली मीटिंग की योजना बनाई जाए, ताकि सुधारात्मक न्याय व्यवस्था मजबूत हो। इसी तरह, उन्होंने महिला सरपंच को गलत तरीके से हटाए जाने के मामले में न्याय बहाल किया और ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने पर बल दिया।
5 अक्टूबर 2018 को जस्टिस सूर्यकांत हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। उनके कार्यकाल में उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए कई कदम उठाए। उन्होंने मामलों के निपटारे की दर बढ़ाई और वकीलों के लिए डिजिटल सुविधाएं शुरू कीं। 24 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। तब से वे कई संवैधानिक बेंचों का हिस्सा रहे। उनके फैसलों में संतुलन और स्पष्टता झलकती है। वे मानते हैं कि न्याय न केवल कानून पर आधारित होना चाहिए बल्कि सामाजिक न्याय को भी सुनिश्चित करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत का योगदान उल्लेखनीय रहा है। वे कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा बने। 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के मामले में पांच न्यायाधीशों की बेंच का हिस्सा थे, जहां कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने को वैध ठहराया। 2024 में इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित करने वाली बेंच में भी वे शामिल थे। इस फैसले ने राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने का मार्ग प्रशस्त किया। पेगासस स्पाईवेयर मामले में उन्होंने सात न्यायाधीशों की बेंच में भाग लिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की निजता का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विशेष जांच समिति गठित की।
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में उन्होंने राजद्रोह कानून को अस्थायी रूप से निलंबित किया। उन्होंने निर्देश दिया कि नई एफआईआर दर्ज न हों और सरकार कानून की समीक्षा करे। 2024 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर सात न्यायाधीशों की बेंच ने 1967 के फैसले को पलट दिया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और न्याय को नई व्याख्या की जरूरत होती है। बिहार चुनावी रोल्स के रिविजन मामले में उन्होंने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि 65 लाख वोटरों की जानकारी सार्वजनिक की जाए। इससे लोकतंत्र की मजबूती हुई। लिंग न्याय के क्षेत्र में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन सहित वकीलों के संगठनों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का आदेश दिया।
2022 में पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा उल्लंघन घटना पर उन्होंने पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अगुवाई में पांच सदस्यीय समिति गठित की। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं की जांच के लिए न्यायिक दिमाग जरूरी है। जस्टिस सूर्यकांत ने जेल सुधारों पर भी विशेष ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि कैदियों के परिवारों पर कैद का असर पड़ता है और इसके लिए 'वीकेंड प्रिजन' जैसी नई व्यवस्था पर विचार किया जाए। ह्यूमन राइट्स, शिक्षा और पर्यावरण मामलों में उनके फैसले प्रगतिशील रहे। उन्होंने 80 से अधिक फैसले लिखे और 1000 से ज्यादा बेंचों का हिस्सा बने।
जस्टिस सूर्यकांत का व्यक्तित्व सरल और विचारशील है। वे कम बोलते हैं लेकिन सवाल गहरे पूछते हैं। कानूनी शिक्षा पर उनका जोर है। वे कहते हैं कि न्याय व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब आम लोग इसे समझें। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने डिजिटल कोर्ट सिस्टम को मजबूत किया। सुप्रीम कोर्ट में भी वे ई-फाइलिंग और वर्चुअल हियरिंग को बढ़ावा देते रहे। उनके कार्यकाल में लंबित मामलों को कम करने के लिए विशेष अभियान चलाने की योजना है। वे स्वदेशी न्यायशास्त्र पर बल देते हैं। एक व्याख्यान में कहा कि विदेशी फैसलों पर निर्भरता कम होनी चाहिए।
शपथ ग्रहण के बाद जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोच्च है। वे संविधान की रक्षा करेंगे और सभी को समान न्याय मिलेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें बधाई दी और कहा कि उनका कार्यकाल न्याय व्यवस्था को नई दिशा देगा। विधि मंत्री मेघवाल ने कहा कि जस्टिस सूर्यकांत का अनुभव अमूल्य है। पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी शुभकामनाएं दीं। समारोह में पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए गए। जस्टिस सूर्यकांत ने परिवार के बुजुर्गों को प्रणाम किया।
यह नियुक्ति वरिष्ठता सिद्धांत पर आधारित है। जस्टिस गवई ने 30 अक्टूबर 2025 को जस्टिस सूर्यकांत का नाम सिफारिश किया। राष्ट्रपति ने इसे स्वीकार कर अधिसूचना जारी की। जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल लंबा है, इसलिए कई महत्वपूर्ण फैसले आने की उम्मीद है। वे जेल सुधार, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल न्याय पर फोकस करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के कर्मचारियों ने उनका स्वागत किया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि टीम वर्क से ही न्याय संभव है।
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