सुप्रीम कोर्ट में लावारिस कुत्तों पर सुनवाई: केंद्र सरकार का पशु प्रेमियों पर तंज, कई लोग चिकन खाकर भी खुद को पशु प्रेमी बताते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली-एनसीआर में लावारिस कुत्तों को हटाने के मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तंज कसते हुए कहा कि कई ...

Aug 16, 2025 - 13:56
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सुप्रीम कोर्ट में लावारिस कुत्तों पर सुनवाई: केंद्र सरकार का पशु प्रेमियों पर तंज, कई लोग चिकन खाकर भी खुद को पशु प्रेमी बताते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में लावारिस कुत्तों पर सुनवाई: केंद्र सरकार का पशु प्रेमियों पर तंज, कई लोग चिकन खाकर भी खुद को पशु प्रेमी बताते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली-एनसीआर में लावारिस कुत्तों को हटाने के मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तंज कसते हुए कहा कि कई लोग चिकन खाकर भी खुद को पशु प्रेमी बताते हैं। यह टिप्पणी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में की, जब वे सरकार की ओर से लावारिस कुत्तों के मुद्दे पर अपनी दलीलें पेश कर रहे थे। कोर्ट ने इस मामले में 11 अगस्त के अपने आदेश पर अंतरिम रोक की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। इस सुनवाई ने न केवल लावारिस कुत्तों की समस्या, बल्कि पशु कल्याण और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी है। तीन जजों की पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल थे, ने स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि इस समस्या का मूल कारण प्रशासन का कोई कदम न उठाना है।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को अपने स्वत: संज्ञान वाले मामले में दिल्ली-एनसीआर के सभी लावारिस कुत्तों को छह से आठ सप्ताह के भीतर सड़कों से हटाकर शेल्टर होम में ले जाने का आदेश दिया था। इस आदेश में जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा था कि कुत्तों को स्थायी रूप से शेल्टर में रखा जाए और उन्हें दोबारा सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर नहीं छोड़ा जाए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन कुत्तों को हटाने में बाधा डालेगा, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश के बाद पशु कल्याण संगठनों और कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी, जिसके चलते कोर्ट में अंतरिम रोक की मांग वाली याचिकाएं दायर की गईं।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से दलील दी कि देश में हर साल 37 लाख कुत्तों के काटने की घटनाएं होती हैं, जो प्रतिदिन औसतन 10,000 मामले हैं। उन्होंने कहा कि इनमें से 305 लोग रेबीज से मर गए, और ज्यादातर पीड़ित बच्चे हैं। मेहता ने तर्क दिया कि यह मुद्दा एक “मौन बहुमत” और “मुखर अल्पसंख्यक” के बीच का है, जहां कुछ लोग पशु प्रेम के नाम पर कुत्तों को सड़कों पर रखने की वकालत करते हैं, जबकि आम लोग कुत्तों के हमलों से डरते हैं। उनकी “चिकन खाकर पशु प्रेमी” वाली टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोरी। कुछ लोगों ने इसे मजाकिया माना, जबकि पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने इसे अपमानजनक बताया।

पशु कल्याण संगठनों की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट में दलीलें पेश कीं। कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला बहुत गंभीर है और इसे गहराई से सुनने की जरूरत है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने शेल्टर होम बनाए हैं या कुत्तों की नसबंदी की है। सिब्बल ने तर्क दिया कि 11 अगस्त का आदेश पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 (एबीसी नियम) का उल्लंघन करता है, जो कहता है कि लावारिस कुत्तों को उनके क्षेत्र से हटाया नहीं जा सकता, बल्कि उनकी नसबंदी और टीकाकरण के बाद वहीं छोड़ा जाना चाहिए।

अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली में इस साल रेबीज से कोई मौत नहीं हुई है, और सरकार ने संसद में भी यह बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 11 अगस्त का आदेश जल्दबाजी में लिया गया, क्योंकि इसमें पशु कल्याण संगठनों से कोई सलाह नहीं ली गई। सिद्धार्थ लूथरा ने भी तर्क दिया कि आदेश से पहले कोई ठोस डेटा या एनजीओ की राय नहीं ली गई। पशु कल्याण संगठनों ने कहा कि दिल्ली में अनुमानित 10 लाख लावारिस कुत्तों को शेल्टर में रखना अव्यवहारिक और अमानवीय है। पेटा इंडिया ने इसे “अवैज्ञानिक और क्रूर” बताया, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि दिल्ली में इतने कुत्तों के लिए शेल्टर बनाना 15,000 करोड़ रुपये का खर्चा मांगता है, जो संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन को उनकी निष्क्रियता के लिए फटकार लगाई। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “इस समस्या का कारण स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता है। सभी हस्तक्षेप करने वालों को जिम्मेदारी लेनी होगी।” कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा जरूरी है, और कुत्तों के हमलों से होने वाली रेबीज की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने 11 अगस्त के आदेश पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन अंतरिम रोक की याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा।

लावारिस कुत्तों की समस्या दिल्ली-एनसीआर में लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में देश में 37 लाख कुत्तों के काटने की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से दिल्ली में 26,334 मामले थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में वैश्विक रेबीज मौतों का 36% हिस्सा है, और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में 65% रेबीज मौतें भारत में होती हैं। दिल्ली में लावारिस कुत्तों की संख्या 2012 के पशुधन जनगणना के अनुसार 60,000 थी, लेकिन कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि यह संख्या 10 लाख तक हो सकती है।

पशु कल्याण संगठनों ने तर्क दिया कि कुत्तों को सड़कों से हटाने के बजाय, नसबंदी और टीकाकरण पर ध्यान देना चाहिए। दिल्ली में केवल 20 पंजीकृत एबीसी केंद्र हैं, जिनमें प्रत्येक में 30-40 कुत्तों की क्षमता है। इन केंद्रों में कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें वापस उनके क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है। संगठनों का कहना है कि 10 लाख कुत्तों को शेल्टर में रखना असंभव है, क्योंकि पर्याप्त शेल्टर नहीं हैं, और मौजूदा शेल्टरों की स्थिति भी खराब है। इससे कुत्तों में तनाव, बीमारी और मृत्यु का खतरा बढ़ सकता है।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने लोगों को दो हिस्सों में बांट दिया है। कुछ लोग कोर्ट के आदेश का समर्थन कर रहे हैं, उनका कहना है कि बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। दिल्ली के मेयर रजा इकबाल सिंह ने कोर्ट के आदेश का स्वागत किया और कहा कि वे छह सप्ताह में इसका पालन करने की कोशिश करेंगे। उन्होंने बताया कि एमसीडी के पास 10 नसबंदी केंद्र हैं, और अस्थायी व स्थायी शेल्टर बनाने की योजना है। दूसरी ओर, पशु प्रेमी और कार्यकर्ता इसे क्रूर और अव्यवहारिक बता रहे हैं। एक एक्स पोस्ट में यूजर ने लिखा, “कुत्तों को शेल्टर में कैद करना क्रूरता है। 

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