रंगभरी एकादशी इस दिन मनाई जाएगी, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय।
रंगभरी एकादशी या आमलकी एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि 27
- रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर रखा जाएगा व्रत
- रंगभरी एकादशी व्रत पारण 28 फरवरी को, सुबह 7 बजकर 07 मिनट से 9 बजकर 28 मिनट तक समय
- फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर रंगभरी व्रत, ब्रह्म मुहूर्त से अभिजीत तक पूजा का समय
रंगभरी एकादशी या आमलकी एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि 27 फरवरी 2026 को देर रात 12 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी और उसी दिन रात 10 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए व्रत 27 फरवरी शुक्रवार को रखा जाएगा। यह एकादशी होली से पहले पड़ती है और भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है।
रंगभरी एकादशी का व्रत रखने वाले भक्त ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि कर विष्णु पूजा करते हैं। शुभ मुहूर्त में पूजा की जाती है। ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 05 बजकर 09 मिनट से 05 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक होगा। विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 29 मिनट से 03 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 17 मिनट से 06 बजकर 42 मिनट तक होगा। इन मुहूर्तों में पूजा और व्रत संकल्प करना शुभ माना जाता है।
रंगभरी एकादशी का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि पर किया जाता है। पारण का मुहूर्त 28 फरवरी 2026 को सुबह 07 बजकर 07 मिनट से 09 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। कुछ स्रोतों में पारण सुबह 06 बजकर 47 मिनट से 09 बजकर 06 मिनट तक बताया गया है। व्रत पारण द्वादशी के दौरान करना चाहिए और हरि वासर समाप्त होने के बाद भोजन ग्रहण किया जाता है। यह व्रत पापों का नाश और पुण्य प्राप्ति के लिए रखा जाता है।
रंगभरी एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। यह फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में पड़ती है। इस दिन आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है इसलिए आंवले की पूजा की जाती है। व्रत रखने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और अक्षय पुण्य मिलता है। तिथि की शुरुआत 26 फरवरी 2026 की रात 12 बजकर 33 मिनट से होती है लेकिन उदया तिथि के अनुसार व्रत 27 फरवरी को रखा जाता है। तिथि समापन 27 फरवरी रात 10 बजकर 32 मिनट पर होता है।
पूजा विधि में भक्त सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर विष्णु मंदिर या घर में पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करते हैं। आंवले का फल या वृक्ष यदि उपलब्ध हो तो उसकी पूजा की जाती है। विष्णु सहस्रनाम या विशेष मंत्रों का जाप किया जाता है। रात्रि जागरण भी महत्वपूर्ण है। शुभ मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त सबसे प्रथम है जहां संकल्प लिया जाता है। अभिजीत मुहूर्त मध्याह्न में पूजा के लिए उपयुक्त है। विजय मुहूर्त दोपहर में विशेष फलदायी माना जाता है। गोधूलि मुहूर्त शाम को आरती और दीपदान के लिए शुभ है।
पारण के समय द्वादशी तिथि में भोजन किया जाता है। पारण मुहूर्त में फलाहार या सामान्य भोजन ग्रहण किया जा सकता है। व्रत में नमक रहित भोजन या फलाहार रखा जाता है। यह एकादशी होली और महाशिवरात्रि के बीच पड़ती है। काशी में इसे विशेष रूप से मनाया जाता है जहां रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव और विष्णु की पूजा होती है। व्रत का महत्व सभी पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति में है। भक्त इस दिन विष्णु भक्ति में लीन रहते हैं।
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