केरल विधानसभा चुनाव 2026: मंजेश्वरम और कासरगोड की सीटों पर कांटे की टक्कर, सियासी दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी।

केरल के उत्तरी छोर पर स्थित कासरगोड जिला इस समय राज्य की राजनीति का सबसे गरम केंद्र बना हुआ है। विशेष रूप से मंजेश्वरम

Apr 7, 2026 - 12:30
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केरल विधानसभा चुनाव 2026: मंजेश्वरम और कासरगोड की सीटों पर कांटे की टक्कर, सियासी दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी।
केरल विधानसभा चुनाव 2026: मंजेश्वरम और कासरगोड की सीटों पर कांटे की टक्कर, सियासी दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी।
  • मंजेश्वरम में के. सुरेंद्रन की थकान और सांगठनिक चुनौतियों के बीच मुकाबला हुआ रोचक, संदीप वारियर के पाला बदलने से बदला समीकरण।
  • कासरगोड के त्रिकोणीय संघर्ष में विकास और स्वास्थ्य सेवाएं बने मुख्य मुद्दे, उत्तर केरल की राजनीति में छिड़ी वर्चस्व की जंग।

केरल के उत्तरी छोर पर स्थित कासरगोड जिला इस समय राज्य की राजनीति का सबसे गरम केंद्र बना हुआ है। विशेष रूप से मंजेश्वरम निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे के. सुरेंद्रन एक बार फिर इसी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी राह पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। पिछले चुनावों में बहुत कम अंतर से हार का सामना करने के बाद, इस बार उन पर न केवल अपनी जीत सुनिश्चित करने का दबाव है, बल्कि लंबे समय से जारी चुनाव प्रचार और सांगठनिक खींचतान के कारण उत्पन्न थकान पर काबू पाना भी एक बड़ी चुनौती है। स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर कुछ मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं, जहां समन्वय की कमी को लेकर कार्यकर्ताओं में असंतोष देखा गया है। इसके बावजूद, वे घर-घर जाकर जनसंपर्क करने और मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा झोंक रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा संदीप वारियर को लेकर हो रही है, जिन्होंने हाल ही में वैचारिक मतभेदों के चलते पाला बदलकर विपक्षी गठबंधन का दामन थाम लिया है। संदीप वारियर का यह कदम न केवल चौंकाने वाला था, बल्कि इसने पूरे जिले के चुनावी समीकरणों को हिला कर रख दिया है। वे वर्तमान में तृक्करीपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं और वहां उन्हें वामपंथी गढ़ को चुनौती देने के लिए मैदान में उतारा गया है। उनके प्रचार अभियान के दौरान हाल ही में कुछ हिंसक झड़पें और अवरोध भी देखे गए, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि उनका प्रभाव प्रतिद्वंद्वी खेमे के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। वारियर अपने भाषणों में लोकतांत्रिक अधिकारों और विकास की बात कर रहे हैं, और उनके समर्थकों का मानना है कि वे इस बार के परिणामों में एक बड़ा उलटफेर कर सबको चकित कर सकते हैं।

कासरगोड जिले की मुख्य विधानसभा सीट पर इस बार त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। यहाँ पारंपरिक रूप से मजबूत रहने वाला मुस्लिम लीग का नेतृत्व वाला गठबंधन अपनी साख बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी तरफ भाजपा और वामपंथी दल अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पड़ोसी राज्य के शहरों पर निर्भरता एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरी है। एंडोसल्फान पीड़ितों की समस्याएं और भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार भी चर्चा के केंद्र में हैं। मतदाता इस बार केवल पहचान की राजनीति पर नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे के विकास और रोजगार के अवसरों पर ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि ऊँट किस करवट बैठेगा, क्योंकि हर दल के पास अपने मजबूत तर्क और समर्पित वोट बैंक हैं।

मंजेश्वरम की बात करें तो यहाँ के. सुरेंद्रन के सामने सबसे बड़ी बाधा उनके हमशक्ल उम्मीदवारों का मैदान में होना भी रहा है, जिसने पिछले चुनावों में उनके वोटों के गणित को बिगाड़ा था। इस बार भी निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी ने मुख्य दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। सांगठनिक स्तर पर पार्टी के भीतर जो असंतोष की खबरें आई थीं, उन्हें दूर करने के लिए शीर्ष नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा है। चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में थकान के बावजूद, रणनीति यह बनाई गई है कि छोटे-छोटे समूहों में बैठकें की जाएं ताकि मतदाताओं से सीधा जुड़ाव बना रहे। यहाँ की जनता भाषाई विविधता को महत्व देती है, इसलिए उम्मीदवारों को अपनी बात पहुँचाने के लिए कई भाषाओं का सहारा लेना पड़ रहा है। चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो कासरगोड में पिछले एक दशक में वोट शेयर में काफी बदलाव आया है। जहाँ एक तरफ मुख्य गठबंधन का वोट प्रतिशत थोड़ा गिरा है, वहीं दूसरी तरफ तीसरे विकल्प के रूप में उभर रही ताकतें अपनी जगह बना रही हैं। इससे जीत का अंतर कम होने की संभावना है।

कासरगोड विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम लीग के उम्मीदवार अपनी विरासत और पुराने कार्यों के दम पर आश्वस्त दिख रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बार कड़ी टक्कर मिल रही है। वामपंथी मोर्चे ने एक स्वतंत्र और प्रभावशाली चेहरे को मैदान में उतारकर मुकाबले को और भी उलझा दिया है। उनका लक्ष्य उन मतदाताओं को अपनी ओर खींचना है जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाकर आधी आबादी को साधने की कोशिश की गई है। यहाँ की राजनीति में सीमावर्ती मुद्दे और व्यापारिक संबंध हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं, और इस बार भी इनके इर्द-गिर्द ही पूरी चुनावी बिसात बिछी हुई है। मंजेश्वरम और कासरगोड की जीत-हार केवल इन सीटों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह पूरे केरल में राजनीतिक हवा का रुख तय करेगी। यदि के. सुरेंद्रन यहाँ से थकान और आंतरिक चुनौतियों को दरकिनार कर जीत दर्ज करते हैं, तो यह उनके राजनीतिक भविष्य के लिए एक नई संजीवनी होगी। वहीं, अगर संदीप वारियर अपने नए गठबंधन के लिए बेहतर परिणाम लाते हैं, तो यह साबित होगा कि व्यक्तिगत छवि और जनसंवाद किसी भी पार्टी की विचारधारा पर भारी पड़ सकते हैं। उत्तर केरल के इन दुर्गों में वर्चस्व की यह लड़ाई अब अपने चरम पर है और अंतिम फैसला जनता के हाथों में है, जो विकास और विश्वास के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए तैयार है।

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