कविता- झिलमिल तारे टांक चुनर में, कर सोलह श्रृंगार सखी...
झिलमिल तारे टांक चुनर में कर सोलह श्रृंगार सखी मदमाती इठलाती देखो कलरव करती निकल पड़ी...
कविता
अमिता मिश्रा, मीतू
झिलमिल तारे टांक चुनर में
कर सोलह श्रृंगार सखी
मदमाती इठलाती देखो
कलरव करती निकल पड़ी
ओढ़े चुनर लहराती सी
स्वप्न संजोए मधुर मिलन के
निर्जन वन से निकल विकल मन
भर आवेग उफनती सी
प्रिय की बाहों का आलिंगन
सोच सोच कर लजा रही
नेह प्रेम से सिंचित मरूथल
पुष्प उगाती राह चली
मन उन्मुक्त तितलियों जैसा
कल कल करती नाच उठी
द्वार पिया के जा खड़ी वो
बलखाती बेकाबू भावुक
सारे बंधन तोड़ मिली
सौंप दिया अस्तित्व स्वयं का
निजता का क्या बोध रहा
सागर भी बाहें फैलाए
प्रेम भरे उदगार हृदय में
गर्जन करता झूम रहा
सफर नदी का पूरा होकर
सागर तट पर उमड़ पड़ा
स्वयं समाहित सागर में हो
प्रेम हृदय का सौंप दिया
हुआ सार्थक मिलन पिया से
झिलमिल सब संसार हुआ।
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