Bollywood: फिल्म इंडस्ट्री पीयूष मिश्रा की नजर में 'बहुत नकली जगह', साहित्य आज तक 2025 में खोले राज।
दिल्ली के इंडिया गेट के पास साहित्य आज तक 2025 का मंच एक बार फिर साहित्य और सिनेमा के प्रेमियों को जोड़ने का केंद्र बना। 21 नवंबर 2025 को
दिल्ली के इंडिया गेट के पास साहित्य आज तक 2025 का मंच एक बार फिर साहित्य और सिनेमा के प्रेमियों को जोड़ने का केंद्र बना। 21 नवंबर 2025 को इस साहित्यिक आयोजन के पहले दिन एक्टर, लेखक और गीतकार पीयूष मिश्रा ने अपनी बेबाक राय से सबको चौंका दिया। मंच संचालिका अंजना ओम कश्यप के सवाल पर कि फिल्म इंडस्ट्री कैसी जगह है, पीयूष ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा, बहुत नकली जगह है। उन्होंने दोहराया, नकली है, बहुत नकली है। लेकिन फिर भी अच्छी जगह है, क्योंकि इसने मुझे बहुत कुछ दिया है। यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और लोगों ने पीयूष की सादगी और सच्चाई की तारीफ की। पीयूष का यह बयान फिल्म इंडस्ट्री की उन कमियों को उजागर करता है, जो लंबे समय से चर्चा का विषय बनी हुई हैं। आइए जानते हैं कि पीयूष ने ऐसा क्यों कहा और इंडस्ट्री की यह नकली दुनिया आखिर है क्या।
पीयूष मिश्रा का सफर फिल्म इंडस्ट्री से कहीं ज्यादा गहरा है। वे एक थिएटर कलाकार के रूप में शुरू हुए, फिर लेखन, गीतकारिता और अभिनय की दुनिया में कदम रखा। 1998 में मणि रत्नम की फिल्म दिल से से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। गुलाल, ब्लैक फ्राइडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर, मकबूल, तमाशा जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं। वे अनुराग कश्याप के करीबी दोस्त हैं और उनकी कई फिल्मों में डायलॉग्स लिख चुके हैं। लेकिन पीयूष हमेशा इंडस्ट्री की सतह के नीचे की सच्चाई बयान करते रहे हैं। साहित्य आज तक के मंच पर उन्होंने कहा कि काम आपको आपके काम से ही मिलेगा। लेकिन रिश्ते, दोस्ती और भावनाएं अक्सर नकली साबित होती हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री ने मुझे बहुत दिया, लेकिन सच कहूं तो वो पूरी नकली है। यह नकलीपन दिखावे, तानों और सतह पर बने रिश्तों में झलकता है।
फिल्म इंडस्ट्री को नकली कहने की वजह पीयूष ने साफ बताई। उनके अनुसार, यहां लोग अपने असली चेहरे नहीं दिखाते। सफलता मिलते ही रिश्ते बदल जाते हैं। वे कहते हैं कि इंडस्ट्री क्रूर भी है। कोई आपकी पीठ थपथपाएगा, लेकिन मौका मिला तो चाकू मार देगा। हाल ही में एक बातचीत में पीयूष ने बॉलीवुड के अजीब स्टारडम पर चुटकी ली। उन्होंने कहा कि यहां के कलाकार 8-9 लोगों का दल-बल लेकर चलते हैं। 12-14 बॉडीगार्ड्स, एक शख्स ड्रिंक लाने के लिए, एक बाल संवारने के लिए। यह सब क्यों? आप अकेले इंसान हैं, कौन मारने आ रहा है? उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा की तारीफ की, जहां बड़ा डायरेक्टर एस शंकर खुद आकर मिले और विनम्रता से बात की। पीयूष ने कहा कि साउथ में कोई हवा नहीं, कोई तानाशाही नहीं। वहां कलाकार जमीन से जुड़े रहते हैं। वहीं बॉलीवुड में लोग हंग-अप्स में जीते हैं, टैनट्रम्स फेंकते हैं।
यह बयान हाल ही में करली टेल्स को दिए इंटरव्यू से लिया गया है। पीयूष ने रणबीर कपूर की तारीफ की, कहा कि वे दुर्लभ हैं। रणबीर को अपनी स्टारडम की पूरी जानकारी है, लेकिन कोई टैनट्रम नहीं फेंकते। तमाशा फिल्म के सेट पर उन्होंने देखा कि रणबीर कितने सहज थे। लेकिन बाकी ज्यादातर युवा सितारे बड़े दल के साथ आते हैं। छह वैनें, दो लाख रुपये के शेफ, और ढेर सारे स्टाफ। यह संस्कृति फिल्मों का बजट बढ़ाती है और प्रोड्यूसर्स को परेशान करती है। करण जौहर और फराह खान जैसे दिग्गज पहले ही इस पर बोल चुके हैं। पीयूष का मानना है कि यह नकलीपन इंडस्ट्री को खोखला बना रहा है। साउथ में वे खुद को ज्यादा सहज महसूस करते हैं। इंडियन 2 फिल्म के सेट पर शंकर की विनम्रता ने उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने कहा, वहां संस्कृति कमाल की है।
पीयूष की यह राय नई नहीं है। वे हमेशा इंडस्ट्री की आलोचना करते रहे हैं। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वरिष्ठ कलाकारों को दूसरों की आलोचना करने की आदत पड़ जाती है। वे कड़वे हो जाते हैं और बाद में खुद पीड़ित होते हैं। उन्होंने कहा, उनका बुढ़ापा बहुत बुरा गया है। पीयूष खुद दूसरों की आलोचना से बचते हैं। वे मानते हैं कि क्रिएटिव काम में सफलता- असफलता दोनों आती हैं। लेकिन बॉलीवुड में लोग जलन और प्रतिस्पर्धा में उलझे रहते हैं। अनुराग कश्याप की फिल्मों पर भी उन्होंने चुटकी ली। कहा कि गुलाल का दूसरा हाफ खराब है, देव डी और गैंग्स ऑफ वासेपुर में भी अनुराग अपना दिमाग खराब कर देते हैं। लेकिन दोस्ती निभाते हुए वे हंसते हुए कहते हैं कि अनुराग को यह सुनकर हंसी आती है। पीयूष का मानना है कि सच्ची दोस्ती कम ही टिकती है।
फिल्म इंडस्ट्री की यह नकली दुनिया कई उदाहरणों से साफ है। नेपोटिज्म का बोलबाला है। आउटसाइडर कलाकारों को संघर्ष करना पड़ता है। सुशांत सिंह राजपूत का केस इसका उदाहरण है। लोग कहते हैं कि बॉलीवुड क्रिएटिवली दिवालिया हो गया है। फेक कंटेंट, बिना लॉजिक की कहानियां, टैलेंटेड राइटर्स और एक्टर्स की कमी। सोशल मीडिया पर लोग #BoycottBollywood ट्रेंड चला रहे हैं। लेकिन पीयूष का नजरिया अलग है। वे कहते हैं कि इंडस्ट्री ने उन्हें बहुत दिया। थिएटर से फिल्मों तक का सफर आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने कभी झुकना नहीं सीखा। साहित्य आज तक पर उन्होंने कहा कि काम से काम मिलेगा। बाकी सब नकली है। यह बयान युवा कलाकारों के लिए सीख है।
पीयूष मिश्रा का जन्म 13 जनवरी 1963 को उत्तर प्रदेश के गोंडा में हुआ। वे आईआईटी बीएचयू से ग्रेजुएट हैं, लेकिन इंजीनियरिंग छोड़ थिएटर में चले गए। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से ट्रेनिंग ली। शुरू में संघर्ष ही था। लेकिन उनकी लेखनी ने नाम कमाया। गुलाल के गाने आरजीआई, रणचंडी जैसे हिट हुए। अभिनय में गैंग्स ऑफ वासेपुर का सरदार खान आज भी आइकॉनिक है। पीयूष ने कहा कि इंडस्ट्री अच्छी है, लेकिन नकली। उन्होंने साउथ की तारीफ की, जहां वे ज्यादा काम करना चाहते हैं। बॉलीवुड में एंट्रेज कल्चर ने सब बर्बाद कर दिया। प्रोड्यूसर्स पर बोझ बढ़ा। एक फिल्म का बजट आधा एंट्रेज पर खर्च हो जाता है। पीयूष खुद सादा जीवन जीते हैं। एक मेकअप आर्टिस्ट और एक मैनेजर काफी।
यह बयान साहित्य आज तक के वीडियो में कैद है। सोशल मीडिया पर लाखों व्यूज हो चुके। लोग कह रहे हैं कि पीयूष ने सच्चाई बोल दी। एक यूजर ने लिखा, बॉलीवुड सनकिंग है नेपोटिज्म और मायोपिक विजन से। दूसरा बोला, इंडस्ट्री फेक मास्क्स से भरी है। पीयूष की बातें इंडस्ट्री को आईना दिखाती हैं। वे कहते हैं कि सच्चे कलाकार को नकली दुनिया में भी अपना रास्ता बनाना चाहिए। साहित्य आज तक जैसे प्लेटफॉर्म पर वे सिनेमा और साहित्य को जोड़ते हैं। उनकी किताबें और गाने भी इसी सादगी से भरे हैं।
पीयूष का यह बयान युवा पीढ़ी को प्रेरित करता है। वे कहते हैं कि मेहनत करो, बाकी सब छोड़ दो। इंडस्ट्री नकली हो सकती है, लेकिन आपका काम सच्चा रहे। साउथ सिनेमा का उदय इसी वजह से है। वहां कहानियां मजबूत, कलाकार जमीन से जुड़े। बॉलीवुड को सबक लेना चाहिए। पीयूष ने रणबीर को अपवाद बताया। कहा कि वे जानते हैं स्टार कौन हैं, लेकिन हवा में नहीं उड़ते। यह तारीफ रणबीर के फैंस को पसंद आई। लेकिन बाकी सितारों पर चुटकी ने बहस छेड़ दी। क्या बॉलीवुड बदल पाएगा? पीयूष का जवाब है, समय बताएगा।
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