मायावती की 'योगी तारीफ' से सियासी हंगामा- राकेश टिकैत बोले- डरा हुआ विपक्ष तानाशाही को जन्म दे रहा।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नौ अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी की एक विशाल महारैली का आयोजन हुआ। यह रैली बसपा के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के अवसर पर कांशीराम
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नौ अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी की एक विशाल महारैली का आयोजन हुआ। यह रैली बसपा के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के अवसर पर कांशीराम स्मारक स्थल पर आयोजित की गई थी। रैली में हजारों समर्थक जुटे, जो दलित और बहुजन समाज के एकजुट होने का संकेत दे रही थी। लेकिन इस रैली का सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंच से वर्तमान योगी आदित्यनाथ सरकार की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने कांशीराम स्मारक और अन्य पार्कों के रखरखाव के लिए टिकटों से आने वाले पैसे को सही जगह खर्च करने का वादा किया है, जबकि पिछली समाजवादी पार्टी सरकार ने ऐसा नहीं किया। इस बयान ने विपक्षी दलों में हड़कंप मचा दिया। कई नेताओं ने इसे राजनीतिक गठजोड़ का संकेत बताया, तो कुछ ने मायावती की आलोचना की। इसी क्रम में किसान नेता राकेश टिकैत ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने विपक्ष को डरा हुआ और बिखरा हुआ बताया तथा चेतावनी दी कि ऐसा विपक्ष देश में तानाशाही को बढ़ावा देता है।
रैली का माहौल बेहद उत्साहपूर्ण था। सुबह से ही बसपा कार्यकर्ता विभिन्न जिलों से लखनऊ पहुंचने लगे। कांशीराम स्मारक स्थल पर नीले झंडे लहराते दिखे, जो बसपा का प्रतीक है। मंच पर मायावती के अलावा उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद भी मौजूद थे। आकाश आनंद ने भाषण में आरक्षण के मुद्दे पर जोर दिया और कहा कि बाबासाहेब अंबेडकर के सपनों को पूरा करने के लिए बसपा संघर्ष जारी रखेगी। उन्होंने कहा कि आरक्षण अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है और बसपा इस दिशा में काम करेगी। मायावती ने रैली को संबोधित करते हुए सबसे पहले कांशीराम को याद किया। उन्होंने कहा कि कांशीराम जी की आखिरी इच्छा थी कि सत्ता की चाबी बहुजन समाज के हाथ में हो। इसके बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोला। मायावती ने कहा कि सपा सत्ता में आने पर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों की याद नहीं रखती। उन्होंने अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव सरकार के समय कासगंज जिले का नाम कांशीराम नगर रखे जाने का जिक्र किया, लेकिन सत्ता में आने के बाद सपा ने इसे बदल दिया। मायावती ने सपा को दोगला चरित्र वाला बताया और कहा कि ये लोग चुनाव के समय ही पीडीए का नारा लगाते हैं, लेकिन सत्ता मिलते ही जातिवादी रंग दिखाते हैं।
मायावती का योगी सरकार पर सबसे बड़ा बयान तब आया जब उन्होंने स्मारक स्थलों के रखरखाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार के समय कई संस्थानों और योजनाओं का नाम कांशीराम के नाम पर रखा गया था, लेकिन सपा ने सत्ता में आते ही इन्हें बंद कर दिया। वहीं, वर्तमान भाजपा सरकार ने हमारी चिट्ठी पर ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि टिकटों से आने वाला पैसा अब स्मारकों की मरम्मत पर लगेगा, इसलिए हम योगी सरकार के आभारी हैं। यह बयान रैली में तालियों की गड़गड़ाहट लेकर आया, लेकिन बाहर विपक्षी खेमे में आग लग गई। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इसे अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा से नजदीकी का संकेत बताया। अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर पलटवार किया और कहा कि मायावती को सच्चाई का सामना करना चाहिए। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी मायावती के बयान की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह विपक्ष की एकता को कमजोर करने की कोशिश है। बसपा के अंदर भी कुछ असंतोष की आवाजें उठीं, लेकिन पार्टी नेताओं ने इसे स्मारकों के हित में बताया।
इस घटना के चार दिन बाद, तेरह अक्टूबर को श्रावस्ती जिले में किसान नेता राकेश टिकैत ने मीडिया से बात की। राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख हैं और किसान आंदोलन के दौरान उनकी सक्रिय भूमिका के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मायावती के बयान पर सीधे टिप्पणी की। टिकैत ने कहा कि मायावती की तारीफ से साफ जाहिर है कि विपक्ष डरा हुआ है। उन्होंने कहा, सरकार ने विपक्ष को डरा कर तोड़ दिया है। अब विपक्ष आपस में लड़ रहा है। टिकैत ने चेतावनी दी कि डरा हुआ विपक्ष देश में तानाशाहों को जन्म देता है। उन्होंने कहा कि जब विपक्ष कमजोर होता है, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। पूंजीवादी ताकतें और तानाशाही का बोलबाला हो जाता है। टिकैत ने विपक्षी दलों से अपील की कि वे आपस में एकजुट हों और सरकार के खिलाफ मुकाबला करें। उन्होंने कहा कि मायावती जैसे बड़े नेता अगर सरकार की तारीफ करने लगें, तो छोटे दल और क्या करेंगे। टिकैत का यह बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया मोड़ ला रहा है। किसान संगठन अक्सर विपक्ष के साथ खड़े दिखते हैं, लेकिन टिकैत का यह बयान भाजपा सरकार पर अप्रत्यक्ष निशाना साध रहा है।
मायावती का बयान और टिकैत की प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, और ऐसे में विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं। बसपा ने रैली में 2027 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने का दावा किया। मायावती ने कहा कि इस रैली में लोग अपनी कमाई के पैसे खर्च कर आए हैं, न कि पैसे देकर बुलाए गए हैं। उन्होंने आकाश आनंद की तारीफ की और कहा कि वे पार्टी के जनाधार को मजबूत करने के लिए मेरे निर्देशन में काम कर रहे हैं। समर्थकों से अपील की कि हर हाल में आकाश का साथ दें। रैली में आरक्षण, संविधान की रक्षा और जातिवाद के खिलाफ नारे गूंजे। लेकिन योगी तारीफ ने विपक्ष को बैकफुट पर ला दिया। समाजवादी पार्टी ने कहा कि यह बसपा का सेल्फ गोल है। कांग्रेस ने इसे भाजपा की चाल बताया। आम आदमी पार्टी और अन्य छोटे दलों ने चुप्पी साध रखी है।
राकेश टिकैत का बयान किसान मुद्दों से जुड़ा हुआ है। वे अक्सर कहते हैं कि किसानों की समस्याएं सुलझाने के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है। उन्होंने हाल ही में बहराइच में भी किसान सभाओं को संबोधित किया था। टिकैत ने कहा कि सरकार किसानों को गुमराह कर रही है। लेकिन मायावती बयान पर उनकी टिप्पणी ने सियासी बहस छेड़ दी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विपक्ष की रणनीति पर सवाल खड़े कर रहा है। भाजपा ने इसे अपनी लोकप्रियता का प्रमाण बताया। योगी सरकार के मंत्री ने कहा कि मायावती ने सच्चाई स्वीकार की है। विपक्षी नेता चंद्रशेखर आजाद ने भी मायावती पर तंज कसा और कहा कि वे भाजपा से डर गई हैं।
यह घटना उत्तर प्रदेश की जटिल राजनीति को दर्शाती है। जहां एक तरफ दलित वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता पक्ष की तारीफ से नई बहस शुरू हो गई। मायावती ने रैली में संविधान को बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के समय संविधान को कुचला गया था, आज भी खतरा है। ईवीएम पर सवाल उठाए और बैलेट पेपर की मांग की। बसपा ने कहा कि 2007 में पूर्ण बहुमत वाली सरकार को षड्यंत्र से गिराया गया। अब 2027 में वापसी का संकल्प है। टिकैत ने विपक्ष को एकजुट होने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आंतरिक कलह से कुछ नहीं होगा। देश के लोकतंत्र के लिए विपक्ष मजबूत बने।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि उत्तर प्रदेश में सियासी समीकरण बदल रहे हैं। मायावती का बयान बसपा को नया आयाम दे सकता है या विपक्ष से अलग कर सकता है। राकेश टिकैत की चेतावनी ने बहस को गहरा दिया। किसान, दलित और पिछड़े वोटों का समीकरण अब नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में और प्रतिक्रियाएं आएंगी। फिलहाल, यह सियासी भूचाल उत्तर प्रदेश को नई दिशा दे रहा है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2027 चुनाव में यह मुद्दा बड़ा भूमिका निभाएगा। बसपा की रैली ने दिखाया कि पार्टी अभी भी मजबूत है, लेकिन तारीफ ने सवाल खड़े कर दिए। टिकैत का बयान विपक्ष को आईना दिखा रहा है।
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